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पंकज उधास-चिट्ठी आई है

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चिट्ठी आई है
   गायक - पंकज उधास


चिट्ठी आई है आई है
चिट्ठी आई है
चिट्ठी आई है वतन से
चिट्ठी आई है

बड़े दिनों के बाद,
हम बेवतनों को याद
वतन की मिट्टी आई है,
चिट्ठी आई है ...

उपर मेरा नाम लिखा है,
अंदर ये पैग़ाम लिखा है
ओ परदेस को जाने वाले,
लौट के फिर ना आने वाले
सात समुंदर पार गया तू,
हमको ज़िंदा मार गया तू
खून के रिश्ते तोड़ गया तू,
आँख में आँसू छोड़ गया तू
कम खाते हैं कम सोते हैं,
बहुत ज़्यादा हम रोते हैं
चिट्ठी आई है ...

सूनी हो गईं शहर की गलियाँ,
काँटे बन गईं बाग की कलियाँ
कहते हैं सावन के झूले,
भूल गया तू हम नहीं भूले
तेरे बिन जब आई दीवाली,
दीप नहीं दिल जले हैं खाली
तेरे बिन जब आई होली,
पिचकारी से छूटी गोली
पीपल सूना पनघट सूना
घर शमशान का बना नमूना
फसल कटी आई बैसाखी,
तेरा आना रह गया बाकी
चिट्ठी आई है ...

पहले जब तू खत लिखता था
काग़ज़ में चेहरा दिखता था
बूँद हुआ यह मेल भी अब तो,
ख़तम हुआ यह खेल भी अब तो
डोली में जब बैठी बहना,
रास्ता देख रहे थे नैना
मैं तो बाप हूँ मेरा क्या है,
तेरी माँ का हाल बुरा है
तेरी बीवी करती है सेवा,
सूरत से लगती है बेवा
तूने पैसा बहुत कमाया,
इस पैसे ने देश छुड़ाया
पंछी पिंजरा तोड़ के आजा,
देश पराया छोड़ के आजा
आजा उम्र बहुत है छोटी,
अपने घर में भी हैं रोटी,
चिट्ठी आई है

 


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