'फूँक' की सफलता के तुरंत बाद जब 'फूँक2' की घोषणा की गयी तो निर्माता राम गोपाल वर्मा ने वादा किया था कि और ज़्यादा डर, और ज़्यादा चीख, और ज़्यादा उत्तेजना होगी 'फूँक2' में|
इस बार उन्होने निर्देशन का भार सौंपा है मिलिंद गडगकर को, और संगीत दिया है राहुल पांदिरकर ने| लेकिन ये नयी कास्ट कुछ नया नही कर पाती है, और 'फूँक2' ना तो 'फूँक' की कसौटी पर खरा उतरती है और ना ही किसी भी वादे पर जो राम गोपाल वर्मा ने किए थे|
'फूँक' की कहानी ख़त्म होती है जब मधु(अश्विनी कालसेकर) की मौत होती है| 'फूँक2' शुरू होती है जब मधु का भूत राजीव(सुदीप) से बदला लेने वापस आता है| राजीव अपने परिवार के साथ अब एक वीरान जगह पर रहता है| जब बच्चे रक्षा(अहसास चन्ना ) और रोहन (राहुल पेंढलकर) इस नयी जगह रमणीक भ्रमण करने निकलते है तो जंगल के पास उनको एक गुड़िया मिलती है, और रक्षा उस गुड़िया को अपने साथ ले आती है| बस इसके बाद राजीव और उसके परिवार की मुश्किले बढ़ती चली जाती है| जब राजीव मूरतुज़ा(ज़ाकिर हूसेन) की फिर से मदद माँगने जाता है तो उसका दर्दनाक अंत अपनी आँखो से देखता है| ये दृश्य इस फिल्म का एक मात्र खौफनाक दृश्य है|
अश्विनी कालसेकर अपने प्रतयक्श रूप मे इस फिल्म में मौजूद नही है, उनकी केवल छाया ही है जो कोई प्रभाव नही छोड़ती है और ना ही निर्देशक मिलिंद गडगकर भी एहसास चन्ना का प्रदर्शन दोहरा पाते है| केवल आरती (अमृता खानविलकर) अपने पिछले प्रदर्शन को सुधार पाती है| फिल्म में डरने क लिए सिर्फ़ केमरा कोण को तेज़ी से बदला गया है और तेज नेपथ्या ध्वनि का अत्यधिक प्रयोग किया गया है, लेकिन कोई भी समझदार दर्शक इस पेशपेश में रहता है की कहानी में ऐसा क्या है जिससे वो डरे?
फिल्म का अंत भी दर्शकों को असमंजस मे डाल देता है, शायद निर्देशक 'फूँक3' की कहानी के लिए रास्ता बनाने की कोशिश कर रहे थे, परंतु फूँक2 किसी भी कसौटी पर खरी नही उतार पाती और ना ही राम गोपाल वर्मा के किसी भी वादे को पूरा कर पाती है|
निर्देशक: मिलिंद गडगकर
निर्माता: राम गोपाल वर्मा
कलाकार: सुदीप, अमृता खानविलकर, एहसास चन्ना
संगीत: राहुल पांदिरकर
