राकेश रोशन के निर्देशन की यह विशिष्टता रही है कि वह फिल्मोद्योग में प्रचलित धाराओं से एक कदम आगे की फिल्में बनाते हैं | माँ की त्याग और महानता पर पहले भी कई सफल फिल्में बन चुकी हैं, इस फिल्म में भी एक माँ के असीम धैर्य एवं संघर्ष को दिखाया गया है पर भूमिका ज़रा अलग है |इस फिल्म की माँ अपने दो युवा बेटों को खोने के बाद अपने विश्वास व दृढ़ संकल्प शक्ति के बूते प्रकृति का निर्णय अपने पक्ष में कर लेती है और उसके दोनों बेटे वापस आते हैं- पुनर्जन्म लेकर |माँ के अलावे इस फिल्म के लिए दो पर्याय शब्द चुनने हों तो पुनर्जन्म और बदला सटीक शब्द होंगे|
दुर्गा ( राखी) के पति अपने भाई दुर्जन सिंह (अमरीश पूरी) के अत्याचारों का विरोध करते हैं पर इसका नतीजा उन्हें अपनी जान गँवानी पड़ती है| दुर्गा अपने जुड़वाँ बच्चों की जान बचाने के लिए हवेली से भाग निकलती है |वह एक गाँव में आश्रय लेती है और अकेली ही अपने बच्चे करण और अर्जुन का पालन पोषण करती है| युवा होने पर करण (सलमान खान) और अर्जुन( शाहरुख़ खान) को जब अपनी पुस्तैनि हवेली के बारे में पता चलती है, तो वो अपने दादा बड़े ठाकुर से मिलने हवेली पहुँच जाते हैं पर एक बार फिर दुर्जन सिंह न केवल अपने पिता बल्कि दोनो भाइयों का कत्ल करके हवेली पर क़ब्ज़ा जमा लेता है|गम में पागल दुर्गा अपने बेटों की मौत को स्वीकार नहीं करती और माँ काली के मंदिर में इंसाफ़ मांगती है ,कुछ इस तरह कि उसी रात करण अजय के रूप में और अर्जुन विजय के रूप में अलग अलग परिवारों में जन्म लेते हैं | लेकिन दुर्गा की नाराज़गी व अनुरोध माँ काली से अनवरत चलती रहती है| अजय बड़ा होकर मुक्केबाज़ बनता है और विजय एक कुशल घुड़सवार | सत्रह वर्षों के बाद ये दोनों पुनः दुर्गा की जिंदगी में आते है और दुर्जन सिंह से बदला लेने को एक बार फिर तैयार हो जाते हैं|
फिल्म की शुरुआत में ही प्रोडक्शन हौउस फिल्मक्राफ्ट की यह घोषणा कि "यह फिल्म मूलतः विश्वास की ताक़त पर टीका हुआ है जिसमें असंभव को भी संभव कर दिखाने की ताक़त होती है " कहीं न कहीं भारतीयों के कौतुकप्रेमी और अंधविश्वासी होने का इशारा करता है जबकि आज के युग में ऐसे विश्वास को केवल अंधविश्वास ही कहा जासकता है | सार्थक सिनेमा पसंद करनेवालों को यह फिल्म निराश करेगी क्योंकि यह मसाला फिल्मों की तरह एक पूर्ण मनोरंजक फिल्म है|अगर तर्क व सार्थकता को भूलकर यह फिल्म देखें तो इस फिल्म का पूरा आनंद उठा सकते हैं | फिल्म के कई दृश्य दिल छूते हैं| जैसे दोनों बेटे खोने के बाद मंदिर में दुर्गा के संवाद या पुनर्जन्म के बाद करण अर्जुन का पुनः दुर्गा से मिलना- ये ऐसे दृश्य हैं जो भावुक कर जाते हैं|
अभिनय की बात करें तो शाहरुख़ और सलमान की जोड़ी ने हमेशा सफलता पाई है| करण अर्जुन में भी यह जोड़ी अपना कमाल दिखाने में आगे रही | सलमान खान की एक्शन प्रधान पर शांत भूमिका काफ़ी उभर कर आई है दूसरी तरफ शाहरुख की भूमिका में शोखी, दर्द एवं त्रासदी के रंग छलकते हैं| इस फिल्म में अभिनेत्रिओं के लिए कुछ करने को था ही नहीं, यही वजह रही होगी कि उस समय की नामचीन अभिनेत्रिओं ने इस फिल्म में रूचि नहीं दिखाई| काजोल और ममता कुलकर्णी भी इस फिल्म में शो पीस की तरहनज़र आए हैं फिर भी काजोल का अभिनय अपने निशान छोड़ जाता है| हां, माँ की भूमिका को राखी ने बेहद जीवंतता प्रदान की, जैसे इस फिल्म में अभिनय का सारा दारोमदार राखी के उपर ही टीका है| अमरीश पूरी पक्के आततायी नज़र आए हैं | पर्दे पर उनकी उपस्थिति से ही माहौल ख़ौफजदा हो जाता है| फिल्म इंडस्ट्री को ऐसा 'बेडमेन' शायद ही फिर कभी मिले !
इस फिल्म की ख़ासियतों में एक इसका कर्णप्रिय संगीत है| अपने भाई की फिल्म के लिए राजेश रोशन का संगीत हमेशा बेहतरीन होता है| सभी गाने खास हैं पर 'जाती हूँ मैं', गुपचुप' और लता मंगेशकर की गायकी में 'एक मुंडा' समा बाँधनेवाले गाने हैं| 'जय माँ काली' गाना में ड्रम का प्रयोग काफ़ी प्रभवोदपादक है| गाने अधिक हैं पर उनके संगीत और छायांकन की खूबसूरती फिल्म के प्रवाह को नहीं रोकती |
करण अर्जुन जबरदस्त हिट रही जबकि उसी वर्ष दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे और रंगीला ने भी बॉक्स ओफिस पर धमाल मचाया था | फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों की बात करें तो इस फिल्म को कई श्रेणिओ हेतु नामित किया गया था लेकिन दो तकनीकी श्रेणिओ (एक्शन निर्देशन व संपादन) के लिए पुरस्कार मिला|
पुनर्जन्म व भाग्य में विश्वास रखनेवालों का लोगों का प्रतिशत जो भी हो पर इस फिल्म के सफलता का इतिहास यही साबित करता है कि यह फिल्म दर्शकों को प्रभावित और आकर्षित करने में सफल रही |
अंक: ***
| निर्देशक: | राकेश रोशन |
| निर्माता: | राकेश रोशन |
| लेखक: | सचिन भोव्मिक, रवि कपूर |
| कलाकार: | शाहरुख़ खान, सलमान खान, काजोल, अमरीश पूरी,जोहनी लीवर,ममता कुलकर्णी, राखी |
| संगीत: | राजेश रोशन |
| फिल्म रिलीज़: | 13 जनवरी 1995 |
