घातक (Ghatak Movie)

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घातक

 

"अब जो चलेगा, अपने पैरों पर चलेगा, पुलिस की बैसाखी लेकर नहीं क्योंकि जो गुर्दा रखते हैं उन्हें ही जीने का हक होता है |"
आँखों से चिंगारिया बरसती नायक के मुँह से ऐसे झन्नाटेदार संवाद इस फिल्म की ख़ासियत है | एक ऐसी ख़ासियत जो राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित अन्य फिल्मों की फेहरिस्त में घातक को अलग करती है | घातक इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि इस फिल्म को दो दो फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिले, साथ ही यह फिल्म मीनाक्षी शेषाद्री की आखरी फिल्म है |

कहानी: स्वतंत्रता सेनानी व समाज सेवी शंभूनाथ (अमरीश पूरी) की बनारस में काफ़ी प्रतिष्ठा है | यहाँ उनके साथ उनका दतक पुत्र काशीनाथ (सन्नी देओल) भी रहता है | शंभूनाथ की तबीयत खराब होने पर डॉक्टर उसे मुंबई ले जाने की सलाह देते हैं| इसके बाद दोनों मुंबई रवाना हो जाते है जहाँ शंभूनाथ का बड़ा बेटा शिव (के.के.रैना) रहता है|

जब दोनों मुंबई में शिव की रिहाइश पर पहुँचते हैं तो पाते हैं कि वह पूरा इलाक़ा एक क्रूर अपराधी कात्या ( डैनी डेंजोगपा) के नियंत्रण में है | सभी कात्या के नाम से ही काँपते हैं| उसी मुहल्ले का एक युवक सचदेव (ओम पूरी) चुपचाप कात्या के खिलाफ लोगों को एकजुट करने की कोशिश करता है | कात्या को इस बात की भनक मिल जाती है और वह खुलेआम सचदेव की हत्या कर देता है |

काशी यह सब देखकर कत्या के विरोध का फ़ैसला कर लेता है, इस बात से अंजान कि ख़तरे की तलवार न सिर्फ़ उसके पिता और भाई पर बल्कि भाभी और बच्चों पर भी लटक चुकी है |

एक साधारण सी कहानी, कसी हुई पटकथा एवं जोशीले संवाद के साथ इस फिल्म में राजकुमार संतोषी का निर्देशन अपने पूरे प्रभाव में है, जिसके कारण घातक उनकी बेहतरीन कृतियों में से एक बन गई| सन्नी देओल के साथ राजकुमार संतोषी की फिल्में हमेशा कुछ खास होती हैं| विशेषकर सन्नी देओल की बात करें तो फिल्म घायल ने उन्हें पहली फिलफेयर पुरस्कार दिलाई वहीं दामिनी में उन्हें सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला |

फिल्म के कुछ दृश्य दिल छूते हैं, जिनमें वह दृश्य जब कात्या और उसके गुंडे शंभूनाथ को कुत्ता बनकर भूंकने को कहते हैं, बेहद मार्मिक बन पड़ा है | संवाद की बात करें तो न सिर्फ़ सन्नी देओल वरण अमरीश पूरी एवं डैनी डेंजोगपा के संवाद भी काफ़ी जोरदार हैं |

'ये मजदूर का हाथ है कात्या, लोहे को पिघलाकर उसका आकार बदल देता है और यह ताक़त पसीने से कमाई रोटी की होती है|'

'डरकर वो लोग जीते हैं कात्या, जिसकी हड्डियों में पानी भरा होता है! अगर मर्द बनने का इतना ही शौक है तो इन कुत्तों का सहारा लेना छोड़ दे |'

पूरी फिल्म के दौरान ऐसे संवाद दर्शकों में जोश भर देते हैं | अन्य पक्ष की बात करें तो पूरी फिल्म में एक भी दृश्य अनावश्यक नहीं लगा, ऐसे चुस्त संपादन के लिए वी.एन.मेयेकर को फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला |

संगीत: घातक के लिए अनु मलिक के संगीत पर राहत इंदौरी ने गीत दिया था| कुल पाँच गानों में निगाहों ने छेड़ा और एक दिल की दीवानी गाने कर्णप्रिय हैं| 'कोई जाए तो ले आए' फिल्म का सबसे सफल गाना है जिसमें ममता कुलकर्णी ने आयटम नृत्य किया है|

इस फिल्म का अदायगी पक्ष सबसे सबल रहा| बात सन्नी देओल से शुरू करें तो दमदार संवाद, आँखों में चिंगारी और सन्नी की दहाड़- काशीनाथ का पात्र जैसे सन्नी देओल के लिए ही बना था| अमरीश पूरी को सकारात्मक भूमिका में देखना काफ़ी सुखद है जिसमें एक पिता की संवेदनशीलता के साथ एक सेनानी का जज़्बा दिखता है| इस पात्र ने उन्हें फ़िल्मफ़ेयर भी दिलाई| साथ ही डैनी हमेशा की तरह बेहतरीन थे एवं मीनाक्षी शेषाद्री अपनी सीमित सी भूमिका में प्रभावित करने में सफल रही|

सन्नी देओल की अपनी खास अंदाज के साथ बेहतरीन निर्देशन एवं अदायगी देखनी हो तो यह फिल्म पूर्ण मनोरंजक है|

इस फिल्म की समीक्षा लिखिए 

निर्देशक राजकुमार संतोषी
निर्माता राजकुमार संतोषी
कहानी   राजकुमार संतोषी
संगीत   अनु मलिक
कलाकार  सन्नी देओल,डैनी,अमरीश पूरी,मिनाक्षी शेषाद्री
फिल्म रिलीज़   8 नवम्बर,1996

 

 

 

 

 

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