"तेरा क्या होगा कालिया" संवाद आज तक सबके दिलो दिमाग पर है| हिन्दी सिनिमा की सबसे प्रशंसनीय फ़िल्मो मे से एक फिल्म है शोले| एक गाँव रामगढ़ मे निर्देशित, यह एक परंपरागत हिन्दी फिल्म है जो आज तक हिन्दी फिल्म प्रशंसको के दिल मे घर कर बैठी है| हज़ारो बार देखने बाद भी लोग इसे देखते नही थकते| जय और वीरू की दोस्ती, गब्बर सिंह का डर, सूरमा भोपाली और जैलेर का हास्य, और टाँगेवाली बसंती और उसकी धन्नो- हर पात्र ने दिलो दिमाग़ पर अपनी छाप छोड़ी है|
फिल्म की कहानी देखी जाए तो बहुत ही साधारण है पर रमेश सिप्पी के निर्देशन ने इसमे अलग ही जान डाल दी थी| ठाकुर बलदेव सिंह( संजीव कुमार), सेवा निवृत पुलिस अफ़सर, डाकू गब्बर सिंह(अमजद ख़ान) को गिरफ्तार करते है पर वो जेल से भागने मे क़ामयाब हो जाता है| बदला लेने के लिए वह ठाकुर के परिवार का खून कर देता है| ठाकुर गब्बर को जिंदा पकड़ने के लिए दो बहादुर लोफर जय (अमिताभ बच्चन) और वीरू( धर्मेन्द्र ) की मदद लेता है| रामगढ़ में इनकी मुलाक़ात राधा(जया बच्चन) और बसंती( हेमा मालिनी) से होती है| और फिर शुरू होती है गब्बर को जिंदा पकड़ने की कवायद|
फिल्म की सफलता के पीछे एक मुख्य कारण है उसके पात्र| हर पात्र एक दूसरे से भिन्न है और सब कलाकार उसमे फिट बैठते है| जय का निहित व्यंग्य, वीरू का बचकाना हास्य, बसंती की बकबक, ठाकुर का दृढ़ संकल्प. राधा की चुप सोच, गब्बर की दहाड़- हर पात्र की अपनी ही खूबी है| और इन सबके साथ सलीम ख़ान की पटकथा और आर. डी. बर्मन का संगीत|
इस फिल्म के कई ऐसे दृश्य है जो आज भी फ़िल्मो मे आज़माए जाते है:
वीरू का पानी की टंकी से आत्महत्या का ड्रामा
जय का वीरू के लिए मौसीजी से बसंती का हाथ माँगना
हेलेन का महबूबा महबूबा गाना
सलीम-जावेद की जोड़ी ने संवादों में रचनात्मक काम किया है| उनमे से कुछ प्रसिद्ध है:
“अर्रे ओ सांभा, कितने आदमी थे?”
“बहुत याराना लगता है, एह?”
“इतना सन्नाटा क्यू है भाई”
“वोही कर रहा हून भैया जो मजनू ने लैला के लिए किया था, रांझा ने हीर के लिए था, रोमीयो ने जूलिएट के लिए था… सुसाईड “
“तुम्हारा नाम क्या है बसंती? ”
“साला नौटंकी, घड़ी घड़ी ड्रामा करता है"
गीत:
होली के दिन महबूबा ओ महबूबा शोले - यह दोस्ती कोई हसीना जब तक है जान
निर्देशक: रमेश सिप्पी
निर्माता: जी.पी. सिप्पी
कलाकार: अमिताभ बच्चन,जया बच्चन, धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी, संजीव कुमार,अमजद खान ,असरानी
संगीत: आर.डी.बर्मन





11 नवम्बर)

(30 सितम्बर)



















