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शतरंज के खिलाड़ी (Shatranj Ke Khialdi Movie)

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शतरंज के खिलाड़ी

शतरंज के खिलाड़ी सत्यजीत रे द्वारा निर्देशित पहली गैर बंगाली भाषा की फिल्म थी ! फिल्म 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से एक साल पहले की प्रष्ठभूमि पर है ! जब ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी उपनिवेशवाद नीति के तहत विभिन्न भारतीय साम्राज्य और राजाओं को सीधे अपने अधीन कर रही थी ! अवध (लखनऊ) का साम्राज्य सबसे आखिर में कंपनी के अधीन आने वाले राज्यों में से एक था, और अंग्रेजो की सेना जो उस वक्त अफगानिस्तान और नेपाल में युद्ध लड़ रही थी उसके लिए धन का स्रोत था !


फिल्म मुंशी प्रेमचंद की एक लघुकथा पर आधारित है ! अवध के तात्कालीन बादशाह वाजिद अली शाह (अमजद खान) है जिसे कम्पनी राजगद्दी से हटाने की योजना बना रही  है, और बादशाह प्रशासन से दूर अपनी कला के प्रदर्शन और विलासता में डूबा हुआ है ! कम्पनी इस सत्ता परिवर्तन के लिए एक वैध रास्ता अपनाना चाहती है जिसके लिए वो एक नया सन्धि पत्र तैयार करती है जिस पर उसे बादशाह के दस्तखत चाहिए!

इन सभी राजनैतिक उथल-पुथल के बीच नवाब के अधीन बैठे दो जागीरदार मिर्ज़ा सज्जाद अली (संजीव कुमार) और मिर्ज़ा रोशन अली (सईद जाफरी) जिनके ऊपर अवध की रक्षा का जिम्मा भी है, अपने अंतहीन शतरंज के खेल में लगे हुए हैं| यहाँ तक की खेल की वजह से जहा मिर्ज़ा सज्जाद अली अपनी पत्नी खुर्शीद (शबाना आज़मी) से बेपरवाह हैं वही मिर्ज़ा रोशन अली अपनी पत्नी नफीसा (फरीदा ज़लाल) के अपने ही दूर के रिश्तेदार अकील (फारुख शेख) के प्रति आकर्षित होने को नज़र अंदाज़ किये हुए हैं !

दोनों ही खिलाड़ी इस बात से अनजान है की  अंग्रेज न सिर्फ शतरंज भी दूसरे तरीके से खेलते हैं बल्कि उनकी राजनीति चालें भी अलग अलग हैं| अंग्रेज रेसिडेंट जेम्स ओउट्राम (रिचर्ड एटनबरो) बड़ी चतुराई से बादशाह के कला प्रेम को विलासता का रूप देकर उसे अयोग्य साबित करता है और उसे हटाये जाने के लिए एक नयी संधि बनाता है !

दूसरी तरफ अहंकार से भरे हुए दोनों शतरंज के खिलाड़ी घरवालों की वजह से अपने खेल में आ रहे व्यवधान से तंग आकर और अवध की रक्षा के लिए कदम उठाने की संभावना से भाग कर  लखनऊ से दूर एक गाँव में जाकर खेलने की योजना बनाते है इस सच को नज़रंदाज़ करके कि अंग्रेजी सेना कभी अवध पर अपनी सत्ता जमा सकती है !

सत्यजित रे द्वारा निर्देशित यह सबसे महंगी फिल्म थी जिसमे हिंदी फिल्म जगत के कई बड़े अभिनेता और हालीवुड के रिचर्ड एटनबरो ने काम किया| किसी भी एतिहासिक फिल्म की पटकथा की खूबी इस बात पर निर्भर करती है कि तथ्यों को तोडा मरोड़ा ना जाए और ये बात तब और मुश्किल हो जाती है जब उन्ही तथ्यों के साथ निर्देशक आम धारणा के विपरीत दूसरे पहलू को भी सामने रख पाने में सफल हो| और इस महान निर्देशक की ये खूबी रही की उनकी ज्यादातर फिल्मों में कोई विलेन नहीं होता बल्कि अच्छे और बुरे दोनों ही पात्रों को अपनी बात कहने का मौका मिलता है| नवाब वाजिद अली शाह के लिए आम धारणा ये है की वो एक सिर्फ विलासी और अयोग्य राजा था, लेकिन इस फिल्म में भी निर्देशक तथ्यों को बिना तोड़ेमरोड़े, नवाब वाजिद अली शाह को अपनी बात कहने का मौका देता है और आप नवाब की बातो से इत्तेफाक भी रखेंगे| दूसरी तरफ अंग्रेज रेसिडेंट भी अपनी जगह सही है और वो किसी भी राजा, जो दरबार से ज्यादा कला में रूचि रखता हो, को राज गद्दी से हटाना, ब्रिटिश राज के प्रति अपना कर्तव्य समझता है| वही दोनों शतरंज के खिलाड़ियों की कहानी प्रतीकात्मक होकर भी मुख्य कहानी की तरह आगे बढती है!

निर्देशक ने उस वक्त के उत्तरदायी व्यक्तियों के उदासीन और विलासी होना दोनों खिलाड़ियों के माध्यम से ही दिखाया है ! दोनों ही जागीरदारों के बीच के संवाद आप को तात्कालीन राजनैतिक स्तिथि से अवगत कराते हैं !

दोनों ही जागीरदारो के बीच के संवादों में अच्छा व्यंग्य है !  फिल्म के संवाद अंग्रेजी में खुद सत्यजित रे ने और उर्दू में शमा जैदी और जावेद सिद्दीकी ने लिखे हैं! जागीरदार और उनके मुंशी के बीच होने वाले संवाद को निहायत ही खूबसूरती से पिरोया गया है जो तात्कालीन अवस्था को ज्यों का त्यों बयान करता है!
मुंशी, अंग्रेजी और हिन्दुस्तानी वज़ह के शतरंज के बीच के अन्तर को समझाते हुए कहता है :-
1) “प्यादा” पहली चाल में दो घर चल सकता है और मुखालिफ सिरे पर पहुँच जाए तो “मलिका” बन जाता है |
2) अंग्रेजी वजह से फायदा है की खेल झटपट ख़त्म हो जाता है !
बादशाह की राज्य के प्रति उदासीनाता और कला के प्रति प्रेम एक संवाद से ही जाहिर है की “सिर्फ शायरी और मोंसिकी ही मर्द के आँखों में आंसू ला सकते हैं”
अंग्रेजी के संवाद कुछ जगहों पर लंबे समय तक हैं जो हिंदी भाषी  दर्शकों को थोडा बेचैन कर सकते हैं|

फिल्म का संगीत सत्यजीत रे ने ही दिया है! फिल्म में संगीत के नाम पर एक ठुमरी है “कान्हा मैं तोसे हारी “ जो न सिर्फ कर्णप्रिय है बल्कि दर्शनीय भी है| जिसे बिरजू महाराज ने स्वयं गाया भी है और नृत्य निर्देशित भी किया है| फिल्म का कला निर्देशन और वेशभूषा काफी सटीक है और ये आप को 1856 में ले जाने में सफल होते हैं ! सिनेमेटोग्राफर सौमेंदु राय ने अच्छा काम किया है और लखनऊ की गलियों और महलों को बखूबी फिल्माया है| दुलाल दत्ता द्वारा की गयी एडिटिंग विशेष ध्यान देने योग्य है| छोटे छोटे दृश्यों को बड़ी खूबी से बीच बीच में डाला गया है| फिल्म में किसी भी नाटकीय पार्श्व संगीत के लिए कोई जगह नहीं है|

फिल्म के सभी कलाकारों संजीव कुमार, सईद जाफरी रिचर्ड एटनबरो शबाना आज़मी तथा अन्य सभी ने अच्छा अभिनय किया लेकिन जिन दो लोगो के अभिनय की बात करनी चाहिए वे हैं अमज़द खान एवं विक्टर बनर्जी ! अमजद खान ने खुद को पात्र में ढालने के लिए अपने हाव भाव का बेहद उम्दा इस्तेमाल किया है वही वे जोर से बोलते हुए कभी कभी अमजद खान ही लगते हैं, विक्टर बनर्जी ने अपनी छोटी सी भूमिका में जान डाली है विशेषतः अपनी संवाद अदायगी में, मुख्यतः बंगाली भाषी होने के बावजूद वे जिस ढंग से उर्दू का उच्चारण करते है वो काबिल-इ-तारीफ है|

फ़िल्म को तीन फिल्मफेयर अवार्ड मिले थे जिसमें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी शामिल था ।
और हाँ फिल्म के सूत्रधार की आवाज़ अमिताभ बच्चन की है !

अंक:***


निर्देशक: सत्यजित रे
निर्माता: सुरेश जिंदल
लेखक: मुंशी प्रेमचंद
कलाकार अमजद खान, शबाना आज़मी, फारुख शेख, संजीव कुमार,  सईद जाफरी
संगीत: सत्यजित रे
फिल्म रिलीज़: 10  मार्च, 1977

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