हिंदी सिनेमा के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की कतार में गरम हवा सबसे कम लागत में बनी फिल्मों में से एक होगी ! 1973 में प्रदर्शित इस फिल्म की लागत 8 लाख रूपए के आस पास थी ! यह पहली फिल्म थी जिसने विभाजन के विनाश के बाद फैली हुई एक अजीब सी शांति के भीतर जा कर जांच पड़ताल की !
फिल्म प्रसिद्ध लेखिका इस्मत चुगताई की एक अप्रकाशित कहानी पर आधारित है ! आगरा में रह रहा है एक जूते का व्यापारी सलीम मिर्ज़ा (बलराज साहनी) जो विभाजन के बाद पाकिस्तान नहीं जाना चाहता और भारत में ही रहना चाहता है ! सलीम मिर्ज़ा की लड़की अमीना अपने ही चचेरे भाई कासिम (जमाल हाशिम) के साथ प्यार करती है और दोनों शादी भी करना चाहते हैं ! अन्य भारतीय मुसलमानों की तरह सलीम मिर्ज़ा के रिश्तेदार भी एक एक करके पाकिस्तान रवाना हो रहे है और कासिम भी अपने पिता के साथ पाकिस्तान जाता है, इस वादे के साथ की वो वापस आकर आमीना से निकाह करेगा !
सलीम मिर्ज़ा दुखी मन से सबको विदा कर रहे हैं इस उम्मीद में कि, एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा ! सलीम मिर्ज़ा अपने बड़े बेटे के साथ अपने व्यवसाय को चलाने में दिक्कत का सामना कर रहा है क्यूंकि उसे आज अपने उन अधिकारों के लिए लड़ना पड़ रहा है जो कल तक उसे आसानी से मुहैय्या थे, जिसकी वजह परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उसका मुस्लिम होना ही है !
इसी बीच अपने वादे के अनुसार कासिम निकाह के लिए वापस आता है लेकिन राजनैतिक कारणों से उसे निकाह के पहले ही गिरफ्तार करके वापस पाकिस्तान भेज दिया जाता है और ये कासिम की अमीना से आखिरी मुलाक़ात साबित होती है! दुखी अमीना को एक बार फिर अपना प्यार शमशाद (जलाल आगा) में दिखता है, जो अमीना को हमेशा ही अपनाना चाहता था ! व्यवसाय में हो रहा नुक्सान और सब जगह से मिल रही मायूसियों की वजह से सलीम मिर्ज़ा का बड़ा बेटा भी पाकिस्तान जाने का फैसला करता है और अब सलीम मिर्ज़ा अपनी बेटी, पत्नी (शौकत आज़मी) और छोटे बेटे सिकंदर(फारूख शेख, जो हमेशा से ही भारत में रहने का पक्षधर है) के साथ भारत में रह जाता है!
अमीना एक बार फिर मायूस है क्युकी शमशाद का परिवार भी पकिस्तान जा रहा है ! एक बार फिर शमशाद भी अमीना से वादा करके जाता है कि वो अपनी माँ को भेजकर उसे पाकिस्तान बुलवा लेगा !
पाकिस्तान में अच्छा भविष्य मिल सकने की उम्मीद, भारत में उसके साथ हो रहा भेदभाव, घर से बेघर हो जाने और दूसरी तरफ बेटी का गम, सलीम मिर्ज़ा की हिम्मत तोड़ देती है और इन परिस्थितियों में वो अपना आखिरी फैसला लेता है !
कम लागत में किसी भी फिल्म को समेटना अपने आप में ही एक चुनौती होती है ! सथ्यू ने निहायत ही नाजुक मामलों को बड़ी संजीदगी से सम्भाला है ! सलीम मिर्ज़ा बैंक मैनेजर और मकान मालिक से बात करते वक्त तथा सिकंदर नौकरी के साक्षात्कार के दौरान, सीधे कैमरे पर बात करता है और सामने वाले व्यक्ति को नहीं दिखाया जाता ! ये बहुत ही प्रभावशाली द्रश्य है जो न सिर्फ सीधे आप से सवाल करते हैं बल्कि ये भी दिखाते हैं कि कैसे कुछ रीढविहीनलोग परदे के पीछे रहकर और अपनी कमजोरी को मजबूरी का नाम देकर अन्याय हो जाने देते हैं !
फिल्म कि पटकथा कैफी आज़मी और शमा जैदी ने लिखा है ! फिल्म के संवाद बहुत ही आम भाषा में हैं और सभी परिस्थितियों का पूरी तरह खुलासा करने में सक्षम हैं. फिल्म मुस्लिम समाज के भीतर और उनके प्रति हो रहे हर तरीके के बदलाव और सोच के सभी पहलुओं को बखूबी छूती है !
- जहाँ एक ओर कुछ लोग सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से पकिस्तान जा रहे थे वही हिंदुओं के प्रति विश्वास आज भी कायम है जैसा कि एक मुस्लिम टाँगे वाला कहता है कि “यहाँ के हिंदू भाई बहुत अच्छे है वो चमड़े के धंदे को हाथ भी न लगायेगे !”
- वही दूसरी ओर एक हिंदू टाँगे वाला सलीम से ज्यादा पैसे की मांग करता है और बदले में कहता है कि “कम पैसे में जाना हो तो पकिस्तान चले जाओ ! “
- बात सिर्फ कुछ हिन्दुओ की ही नहीं बल्कि कुछ मौका परस्त मुसलमानों की भी है, कासिम मिर्ज़ा का पिता जो मुसलमानों का नेता है और अंत तक भारत में रुकने का वादा कर चुपचाप ही पकिस्तान चला जाता है !
- वही दूसरी ओर देश के पढ़े लिखे नौजवानों के लिए समस्याएँ धर्म देख कर नहीं आ रही हैं बल्कि बेरोजगारी सबके हिस्से में है और एक शिक्षित मुस्लिम नौजवान (फारूक शेख) अपनी असफलता को सिर्फ धार्मिक भेदभाव बताकर मैदान छोड़देने में यकीन नहीं रखता !
- साथ साथ अमीना की कहानी विभाजन का आम जिंदगी में पड़ने वाला असर भी दिखाती है !
सिनेमेटोग्राफर ईशान आर्या जो इस फिल्म के निर्माताओं में से एक थे, ने आगरा और फतेहपुर सीकरी के दृश्यों को अच्छे से फिल्माया है ! ईशान आर्य ने एडिटर के काम को आसान किया इसमे बहुत सारे द्रश्य ऐसे हैं जिसमे कोई कट नहीं है ! फिल्म में एक कव्वाली है जिसका संगीत और फिल्मांकन दोनों ही बेहतर हैं.
फिल्म में अदाकारी सबसे ज्यादा काबिल-इ-तारीफ़ है ! सभी कलाकारों ने बेहद उम्दा अभिनय किया है ! गीता काक ने एक आम मुस्लिम लड़की का किरदार अच्छे से निभाया है ! फारुख शेख जिनकी ये पहली फिल्म थी शौकत अजमी जलाल आगा, दीनानाथ जुत्सी , जमाल हासिम सभी अपनी जगह अच्छे हैं ! दादी की भूमिका में एक स्थानीय महिला बदर बेगम को लिया गया जिसने एक मंझे हुए कलाकार की तरह ही काम किया औए उसकी ज़बान में एक स्थानीय महक और हास्य दोनों है ! अब बात बलराज शाहनी की . बलराज शाहनी हमेशा ही प्रतिकियातमक द्रश्यो में बिना संवाद के ही अपनी हाव भाव से सब कुछ कह देने वाले कलाकार है! फिर वो बैंक मेनेजर के सामने हो किराए का मकान ढूँढ रहे हों या अपने बड़े बेटे की बातो को सुनकर जवाब ना दे पा रहे हों. अफ़सोस की ये महान कलाकार अपने इस महान अभिनय को देखने के लिए जिंदा न रहा!
फिल्म को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया जिसमे सदभावना के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार और तीन फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले !
समाज के यथार्थ को सामने लाना ही कला की जिम्मेदारी है !
आज हम जो पेड़ काट रहे हैं उनके बीजों को हम इस फिल्म में बोते हुए देख सकते हैं !
अंक: ***
| निर्देशक | एम्. एस. सथ्यु |
| निर्माता | इशान आर्य , एम्. एस. सथ्यु एवं अबू सिवनी |
| लेखक | कैफी आज़मी , शमा जैदी |
| संगीत | बहादुर खान वारसी |
| कलाकार: | बलराज साहनी, फारुख शेख, गीता काक, शौकत आज़मी, ए. के. हंगल, दीनानाथ जुत्स |
| फिल्म रिलीज़: | 1973 |
