आज कहेंगे दिल का फसाना, जान भी ले ले चाहे ज़माना
मौत वही जो दुनिया देखे घुट घुट कर यूँ मरना क्या,
जब प्यार किया तो डरना क्या...
इस गाने की पंक्तियाँ सुनते ही महान क्लासिक फिल्म मुगल-ए-आज़म की याद आ जाती है जो वक़्त के बंधन से परे आज भी बॉलीवुड के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है| भव्यता, खूबसूरती और संवेदनशीलता से लबरेज़ इस फिल्म का हरेक दृश्य सागर में समाई उन बूँदों की तरह है जिनमें समृद्ध भारतीय सिनेमा की आत्मा दिखती है | फिल्म देखते समय इसकी मुगलोंवाली शानो-शौकत, बेहतरीन लेखन पक्ष एवं बेमिसाल अदाकारी नज़र आती है लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में निर्माता निर्देशक के.आशिफ की वर्षों की तपस्या और समर्पण रची बसी है |
फिल्मकार के.आशिफ अपने संपूर्ण कैरियर में केवल दो फिल्में ही पूरी कर पाए, पहली फूल (1944) एवं दूसरी यह फिल्म, जो भारतीय सिनेमा की सर्वाधिक सफल फिल्मों में से एक बन गई | .. और हो भी क्यों न, इस फिल्म के हर पहलू के पीछे के.आशिफ की 17 वर्षों की मेहनत और शाहख़र्च बजट जो था !
कहानी: यह फिल्म एक लोकप्रिय ऐतिहासिक घटना की दास्तान कहती है| कहानी की शुरुआत में अजीमोशान मुगल शहंशाह अकबर (1556-1605) एवं उनकी महारानी जोधाबाई (दुर्गा खोटे) को काफ़ी इंतेजार और मन्नतों के बाद एक बेटे की चाहत पूरी होती है| बेटे के जन्म की खबर देनेवाली कनीज़ को अकबर अपनी अंगूठी भेंट देते हुए भविष्य में उसकी एक इच्छा पूरी करने का वचन देते हैं|
अकबर का उत्तराधिकारी सलीम बचपन पार कर किशोरवय में कदम रखता है और यहीं से रास रंग में व्यस्त शहज़ादा सलीम के कदम बहकने लगते हैं| इसकी खबर अकबर को हो जाती है और वह सलीम के कड़े प्रशिक्षण के लिए जंग के तपते रेगिस्तानों में भेज देते हैं| 14 सालों बाद जब सलीम (दिलीप कुमार) एक कुशल योद्धा बन जाता है तो उसकी वापसी महल में होती है| हरम की एक नर्तकी अनारकली (मधुबाला) को देखते ही सलीम अपने दिल का चैन खो देता है, उधर अनारकली के दिल का भी यही हाल है|
दोनों बहाने ढूंढते एक दूसरे से मिलने लगते हैं| इस इश्क़ की भनक शहंशाह के कानों में पड़ती है जिसका वह पुरजोर विरोध करते हैं| दो प्रेमियों को जुदा करने की हर कोशिश की जाती है- तहख़ाने और मौत का ख़ौफ़ भी दोनों को अलग नहीं कर पाती| पिता की क्रूरता झेलते थक चुका सलीम बग़ावत पर उतर आता है लेकिन जल्द ही उसका विद्रोह कुचलकर उसे बंदी बना लिया जाता है| सलीम को मौत की सज़ा मिलती है| आख़िर पाक मुहब्बत सामने आती है और अनारकली अपने बदले सलीम की जिंदगी माँग लेती है| अनारकली को जिंदा दीवारों में चुनवाने का फरमान सुनाया जाता है|
इस फिल्म का अंत शहंशाह अकबर के पक्ष में दिखाने के लिए कहानी में थोड़ी फेर बदल की गई और अनारकली को दीवार में चुनवाने के बाद दीवार की दूसरी तरफ से गुप्त निकासी का प्लॉट बनाया गया| यह अंत मूल कहानी से अलग था |फिल्म की शुरुआत से अंत तक दो प्रेमियों के जुनून की इंतेहा दर्शकों को बाँधे रखती है| फिल्म की कहानी के साथ इसकी पटकथा व संवाद में एक अनोखापन है| पूरी फिल्म में वजाहत मिर्ज़ा, कमाल अमरोही एवं अमन के संवाद ऐसे लगते हैं जैसे किसी शायर ने बड़ी ही तल्लिनता से सभी पंक्तियों को रचा हो| कुछ संवाद, जो आज भी याद किए जाते हैं-
1.सलीम अकबर से- "क्या परवरदीगार से आपने मुझे इसलिए माँगा था कि जिंदगी मुझे मिले और उसके मलिक आप हों, साँसें मुझे मिले और धड़कनों पर आपका क़ब्ज़ा हो? ज़िल्लेइलाही क्या मेरी जिंदगी आपकी दुआओं का कर्ज़ा है जो मुझे अपने आँसुओं से अदा करना पड़ेगा?"
2.अनारकली अकबर से- "क़ैदखाने के अंधेरे कनीज़ की आरजूओं की रोशनी से कम थी|"
3.अकबर-"अनारकली, सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और हम तुम्हें जीने नहीं देंगे|"
4.जोधाबाई सलीम से-" हमारा हिन्दुस्तान कोई तुम्हारा दिल नहीं जिसपर एक कनीज हुकूमत करे|"
5.सलीम-"तो मेरा दिल भी आपका हिन्दुस्तान नहीं जो आप उसपर हुकूमत करें |”
ऐसी ही खूबसूरत पंक्तियों से सजी है यह फिल्म जिसमें युद्ध के साँस रोकनेवाले दृश्य, मुगल दरबार की भव्यता, सम्मोहक नृत्य गीत, सलीम अकबर के सामनावाले दृश्य एवं दो प्रेमियो के दिल की मार्मिक कसक- कुल मिलाकर इस फिल्म की श्रेष्ठता को मात देनेवाली फिल्म अभी तक बनी नहीं| यहाँ आर.डी.माथुर के बेहतरीन छायांकन की तारीफ ज़रूर करनी होगी| युद्ध के दृश्य, सलीम अनारकली के रोमांटिक दृश्य...सबसे जबरदस्त दृश्य शीशमहल वाला था जिसमें 'छुप न सकेगा इश्क़ हमारा' गाने की पंक्तियों के फ़िल्मांकन के दौरान मधुबाला की छवि सैकड़ों शीशों में दिखाई दी | ये दृश्य बेहद चर्चित रहे थे|
संगीत: पाँच दशक पूर्व बनी इस फिल्म के सदाबहार संगीत के बारे में कुछ कहना सूरज को दीया दिखानेवाली बात होगी| नौसाद के संगीत पर शकील बदायूँनी के गीतों के मोती कुछ इस अंदाज में झरते हैं जिसका सम्मोहन चकित कर जाता है| कुल 13 गानों के एलबम में 'प्यार किया तो डरना क्या', बेकस पे करम, मोहे पनघट पे, तेरी महफ़िल में, उफ़...किस गाने को शामिल करूँ और किसे छोड़ूं... पर लता मंगेशकर मुगल-ए-आज़म के संगीत की आत्मा हैं| बड़े गुलामअली ख़ान के गाए दो गीत प्रेम जोगन और शुभ दिन आयो अपनी विशिष्ट छाप छोड़ते हैं|
अभिनय: पृथ्वीराज कपूर की रौबदार छवि एवं संवाद अदायगी उन्हें अकबर की छवि में फिट कर गया| दिलीप साहब ने एक दीवाना आशिक़ की भूमिका सहज उत्कंठा के साथ निभाई वहीं उनकी सधी हुई संवाद अदायगी में उर्दू की नज़ाकत बरकरार दिखी| हुस्न की नायाब नगीना मधुबाला अनारकली के गम में रची बसी नज़र आई जिनकी अदायगी नाउम्मीदी के बीच पलते प्यार का गम दर्शकों के दिलों में जगा गई |
वर्ष 2004 में इस फिल्म की रंगीन वर्सन रिलीज़ की गई जो लगातार 25 हफ्तों तक सिनेमाघरों में छाई रही| यह इस बात का सबूत है कि फिल्म मुगल-ए-आज़म की बेशुमार खूबियाँ आज भी हर वर्ग के दर्शकों को आकर्षित करने की क्षमता रखती है|
अंक: ****1/2
| निर्देशक: | के.आसिफ |
| निर्माता: | के.आसिफ |
| लेखक: | के.आसिफ, कमल अमरोही |
| कलाकार: | दिलीप कुमार, मधुबाला, अजित, पृथ्वीराज कपूर, दुर्गा खोटे |
| संगीत: | नौशाद |
| फिल्म रिलीज़: | 5 अगस्त, 1960 |
