'जिसमें है दम, वो है फक़त बाजी राव सिंघम|' यह सिंघम यानि शेर है अजय देवगन, जो इस फिल्म में अच्छे और बुरे की लड़ाई के बीच अच्छाई का सिरमौर है| तमाम मसालों के साथ सिंघम 80 दशक के फिल्मों की याद दिलाती है जिनमें खलनायकों की बेल्ट से पिटाई करने के साथ एक ही घूँसे में 15-20 गुंडों को धूल चटाया जाता था और महिलाओं की छेड़ खानी करने वालों की तो ऐसी की तैसी करदी जाती थी|
ये दृश्य अनगिनत फिल्मों में दिखाए जा चुके हैं पर सिंघम की ख़ासियत है रोहित शेट्टी का निर्देशन, जिसके साथ अजय देवगन की जोड़ी पिछली पाँच फिल्मों में सफलता का सेहरा बाँध चुकी है| इस जोड़ी की पिछली फिल्मों से यह भिन्न श्रेणी की फिल्म है जिसमें हास्य के बजाय बुराई का ख़ात्मा करता नायक शेर जैसा दहाड़ता है| सिंघम के ज़रिए निर्देशक रोहित शेट्टी ने एक अलग श्रेणी की फिल्म में अपना हाथ आजमाया, वह भी अपनी अदाओं के साथ|
कहानी महाराष्ट्र व गोवा की सीमा से सटे एक गाँव शिवगढ़ की है जिसमें बाजीराव सिंघम (अजय देवगन) नाम का एक ईमानदार एवं कर्मठ पुलिस ओफिसर है| वह अपने आदर्शों व सिद्धांतों के बूते अन्याय के विरुद्ध लड़ता रहता है| इसी क्रम में उसका सामना एक ताकतवर अपराधी जयकांत शिक्रे (प्रकाश राज) से होता है जो एक भ्रष्ट नेता है| सिंघम शिक्रे की राह में रुकावट बनकर खड़ा हो जाता है|
इन सबके बीच ही सिंघम की जिंदगी में काव्या (काजल अग्रवाल) आती है लेकिन शिक्रे सिंघम को सबक सीखने के उद्देश्य से उसका तबादला गोवा करा देता है जहाँ शिक्रे का पूरा दबदबा है| वहाँ के नेता, प्रशासन, यहाँ तक कि पुलिस ओफीसरों पर भी शिक्रे की मनमानी चलती है| गोवा पहुँचकर सिंघम की मुलाकात ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर राकेश कदम की विधवा (सोनाली कुलकर्णी) से होती है|
इसके बाद सिंघम वहाँ की पूरी व्यवस्था में बदलाव करने की ठान लेता है, जिसका केंद्र है जयकांत शिक्रे| क़ानून की हद में रहते हुए उसकी ताक़त को ही सिंघम अपना हथियार बना लेता है और शिक्रे के खिलाफ सबूत इकट्ठा करना शुरू कर देता है|
तमिल फिल्म की इस रीमेक को रोहित शेट्टी ने अपनी ही स्टाइल में बड़ी अच्छी तरह संभाला है| फिल्म की कहानी में कुछ भी नयापन नहीं दिखता, बावजूद इसके यह रोहित शेट्टी पैटर्न में ढलकर एक अलग सी फिल्म बन गई है| हाई वोल्टेज ड्रामा और शानदार एक्शन दृश्य के बल पर फिल्म का मनोरंजक पक्ष काफ़ी सुदृढ़ है|
इसकी कहानी साधारण सी है पर सिंघम की पटकथा में वह बात है जो आम दर्शकों को लुभा सके| बिल्कुल 70- 80 दशकों के फिल्म की तरह सिंघम का नायक भी सौ फीसदी अच्छाइयों का पुतला है और खलनायक विशुद्ध शैतान- इस दोनों के बीच के संघर्ष में दर्शक खुद को सिंघम के साथ जुड़ा पाते हैं|
'कुत्तों का कितना ही बड़ा झुंड हो, उनके लिए एक शेर काफ़ी होता है|' या' मेरी ज़रूरतें हैं कम इसलिए मेरी जमीर में है दम|' जैसे फरहाद साजिद के संवाद फिल्म की लयात्मकता बनाए रखते हैं| हालाँकि संवादों में मराठी भाषा का भी उपयोग हुआ है पर वह बाधक नहीं लगती| साथ ही, डुडले का छायांकन उत्कृष्ट स्तर का है जो इस स्टाइलिश फिल्म की खूबसूरती को बरकरार रख पाया|
दमदार एक्शन दृश्य सिंघम की ख़ासियत है जिनमें रोहित शेट्टी व जयसिंह की तकनीक एवं मेहनत नज़र आती है| फिल्म के कमजोर पहलू की बात करें तो अजय देवगन- काजल की प्रेम कहानी अन्य पक्षों के बीच दबकर रह गया| साथ ही संगीत पक्ष भी निराशाजनक है| मराठी फिल्मों के संगीतकार अजय अतुल इस फिल्म में कोई कमाल नहीं दिखा सके| बस शीर्षक गीत सुनने लायक है|
सिंघम के पात्र में रोहित शेट्टी ने जंजीर वाली 'एंग्री यंग मेन' का जादू चलाने की कोशिश की पर यहाँ पटकथा मात खा गई| तो भी अजय देवगन की अदायगी व जबरदस्त एक्शन के साथ उनका शरीर सौष्ठ व सिघम के किरदार को धारदार बना गया| सिंघम को टक्कर देती प्रकाश राज की खलनाय की किसी भी दृश्य में कम तर नहीं लगती| काजल छोटी सी भूमिका में अपनी पूरी प्रतिभा साबित नहीं कर पाई| साथ ही सोनाली कुलकर्णी, सुधांशु पांडे, अनंत जोग एवं सचिन खेड़ेकर अपनी भूमिकाओं में प्रभावी रहे|
निराशाजनक संगीत व अविकसित प्रेम कहानी के बावजूद सिंघम में रोहित शेट्टी अपना जादू जगाने में कामयाब रहे| कुल मिलाकर यह एक ऐसी पैसा वसूल फिल्म है जो पूर्ण मनोरंजन का वादा करती है|
अंक: ****
| निर्देशक | रोहित शेट्टी |
| निर्माता | रीलाएंस एंटरटेनमेंट |
| लेखक | हरी |
| कलाकार | अजय देवगन, काजल अगरवाल, प्रकाश राज |
| संगीत | अजय-अतुल |
| फिल्म रिलीज़ | 22 जुलाई, 2011 |
