आमतौर पर निर्देशकद्वय अब्बास मस्तान रहस्य रोमांचक फिल्मों के लिए जाने जाते है जिसकी ख़ासियत कर्णप्रिय संगीत एवं खूबसूरत कलाकारों का जमावड़ा होता है पर साथ ही यह भी सही है कि इनकी फिल्में हमेशा किसी न किसी हॉलीवुड फिल्म से प्रेरित कही जाती हैं| निर्देशकद्वय की ताजी फिल्म प्लेयर्स में पिछली फिल्मों की ख़ासियतों के साथ एक और खास बात यह रही कि इसके साथ हॉलीवुड की एक नामी गिरामी फिल्म का रीमेक अधिकार भी था|
यह फिल्म थी सन 1969 एवं 2003 में दुबारा निर्मित हॉलीवुड फिल्म 'द इटालियन जॉब'| फिल्म प्लेयर्स पर इसका रंग पूरी तरह चढ़ा हुआ है लेकिन विशुद्ध देशी लहजे के साथ | अभिषेक बच्चन के शब्दों में इस फिल्म को 'द इंडियन जॉब' कहा जा सकता है |
कहानी का नायक है चार्ली मेस्केराहंस (अभिषेक बच्चन) जो एक चार्टर्ड एकाऊटेंट है, तेज दिमाग़ और अचूक योजनाओं के कारण उसे कोई भी काम असंभव नहीं लगता| रात के अंधेरे में चार्ली चोरियाँ किया करता है| चार्ली को अपने एक दोस्त की भेजी ऐसी डीवीडी मिलती है जिसमें अरबों का सोना रशिया से रोमानिया भेजने की पूरीजानकारी होती है|
चार्ली सोना चुराने की योजना तो बनता है पर इस काम को अंजाम देना उसे आसान नहीं लगता| ऐसे में वह अपने उस्ताद विक्टर (विनोद खन्ना) की मदद लेता है| कहने को विक्टर जेल में बंद है पर उसका दबदबा अपराध जगत पर पूरी तरह से है| विक्टर चार्ली को एक टीम देता है जिसका हरेक सदस्य अपने काम में माहिर है|
इसमें बिलाल बशीर (सिकंदर खेर) विस्फोट विशेषज्ञ है, स्पाइडर (नील नितिन मुकेश) कंप्यूटर हैकर है, सनी मेहरा (ओमी वैद्य) हरफ़नमौला हैऔररॉनी (बॉबी देओल) जादूगर है| इस टीम में चार्ली की पार्टनर रिया (विपाशा वासू) भी शामिल हो जाती है और इसके बाद पूरी टीम रशिया रवाना हो जाती है |
यह शातिर टीम सोना चुराने में सफल हो जाती है पर कहानी में जबरदस्त मोड़ तब आता है जब टीम का ही कोई सदस्य सारा सोना उड़ा ले जाता है| शेष कहानी उस सदस्य की पहचान ढूँढने और बदले पर आधारित है |
अब्बास मस्तान के फिल्मों की बात चल रही हो और उसमें धोखे ना हों तो बात हजम नहीं होती| इस फिल्म में भी प्यार और पार्टनर्स के धोखे देखकर निर्देशकद्वय की पिछली फिल्म 'रेस' की याद आती है| प्लेयर्स की तुलना अगर द इटॅलियन जॉब से करें तो फिल्म की कहानी वही है और पटकथा में भारतीय कलेवर भी है पर इसमें कुछ ऐसी कमियाँ हैं जिस कारण शुरू से आख़िर तक रहस्य रोमांच का मज़ा कायम नही रह पाता| संवाद भी ज़रूरत के हिसाब से कम ही लगते हैं |
फिल्म का एक बड़ा भाग पीछा करनेवाले धुआँधार दृश्य और दमदार एक्शन-स्टंट्स से भरा हुआ है | फिल्म के पहले भाग में ट्रेन रॉबरी और अंतिम भाग के चेसिंग सीक़वेंस काफ़ी रोमांचक बन पड़े हैं| एलेन अमीन के एक्शन व स्टंट साँसे रोके रखते हैं वहीं न्यूजीलैंड,रशिया और निदरलैंड के अनछुए दृश्यों को छायाकार रवि यादव ने काफ़ी खूबसूरती प्रदान की|
फिल्म की बात करें तो इसमें धांशू स्टाइल है, नयनसुख पहुँचानेवाले हसीनाओं के जलवे हैं पर कहानी में कई कमजोर पक्ष हैं |यह समझ नहीं आता कि रशिया से चुराया गया टनों सोना सही सलामत न्यूजीलैंड कैसे पहुँच गया| साथ ही चार्ली की गैंग जिस तरह इतनी बड़ी चोरी को अंजाम देती है वह भी हजम होने लायक नहीं है|
पिछली प्रस्तुतियों के मुकाबले इस फिल्म के लिए प्रीतम दा का संगीत औसत कहा जा सकता है | तेरा नशा, जिस जगह पे और दिल ये बेकरार गाने अच्छे हैं पर इनका दृश्यांकन ध्यान खींचता है |
अभिनय की बात करें तो अधिकांश कलाकार अपने हिस्से की भूमिका में जम तो गए पर उसमें आत्मा डालना भूल गए, उनके भावों की कृत्रिमता खलती है | अभिषेक बच्चन के किरदार में कई परतें हैं जिसमें उनकी अदायगी धूम,दस और ब्लफ़ मास्टर की याद दिला गए| बॉबी देओल और सिकंदर खेर के हिस्से कुछ खास था नहीं| पता नहीं एक मूक दर्शक जैसे पात्र को बॉबी ने स्वीकार क्यों किया !
बात नील नितिन मुकेश की करे तो उनकी भूमिका काफ़ी चुनौतीपूर्ण थी जिसके सामने उनकी उर्जा में कुछ कमी दिखी | अभिनेत्रियों में बिपाशा बासु की अदायगी व आवाज़ काफ़ी आत्मविश्वासपूर्ण थी वहीं सोनम कपूर के पात्र में उनकी मेहनत झलकती है | जॉनी लीवर और हिन्दी बोलनेवाली उनकी 'गोरी' बीवी हास्य के श्रोत रहे |
कुल मिलाकर,प्लेयर्स अतिउत्साह के साथ बनाई गई एक ऐसी रोमांचक फिल्म है जो कहीं से भी दर्शकों के साथ भावनात्मक जुड़ाव कायम नही कर पाती, बजाय इसके यह कलाकारों के स्टाइल, एक्शन ,स्टंट व मनमोहक दृश्यांकन की वजह से अवश्य आकर्षित करती है |
अंक: **
| निर्देशक: | अब्बास मस्तान |
| लेखक: | रोहित जुगराज, सुदीप शर्मा |
| कलाकार: | अभिषेक बच्चन, बिपाशा बासु, बोबी देओल, नील नितिन मुकेश, सोनम कपूर, ओम वैद्य, विनोद खन्ना, जोहनी लीवर |
| संगीत: | प्रीतम |
| फिल्म रिलीज़: | 6 जनवरी,2012 |
