आमिर खान का फिल्म में होना जहां फिल्म की सफलता की गारंटी बन चुका है वही आमिर की उपस्थिति से मानदंड इतने ऊंचे हो जाते हैं कि सर्वोत्तम से कम कुछ भी नहीं।तलाश के साथ भी यही हुआ।
तलाश कहानी है पुलिस इंस्पेक्टर शेखावत (आमिर खान) की जो अपने बेटे की मौत का खुद को जिम्मेदार समझता है और इसी अंतर्द्वंद में वो अपनी पत्नी रोशनी (रानी मुखर्जी) के साथ रह रहा है, लेकिन फिल्म कीमुख्यधारा में जो कहानी चल रही है उसमे एक फ़िल्मी सितारे की रहस्यमय परिस्थितियों में एक कार दुर्घटना में मौत हो जाती है जिसकी तहकीकात में पुलिस के सामने कई राज़ खुलते जाते हैं और कहानी में रोज़ी (करीना कपूर), तैमूर (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) के साथ और भी कई पात्र आते हैं।फिल्म की रोचकता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि आप को फिल्म के बारे में कम से कम जानकारी हो।इसलिए बेहतर है कि फिल्म के कहानी कीइससे ज्यादा बात ना कि जाए।
(डर से मुक्त रहो| निडर रहो और परमात्मा मे विश्वास रखो)
भगवद् गीता का ये संदेश शायद ही किसी को याद होगा| गीता का ये संदेश बिना परमात्मा से डरे उनमे विश्वास रखने की सलाह देता है| पर हमारे समाज मे परमात्मा से प्रेम उनके डर से प्रेरित होता है|
फिल्म भक्त और भगवान के रिश्तों को लेकर है और दर्शाती है कि किस तरह हम भगवान-प्रेमी होने की जगह भगवान-भीरू हो गये है|
“अँग्रेज़ चले गये, अँग्रेज़ी छोड़ गये| कुछ इस कदर ही है हमारा प्यार इस भाषा से, कि हमे अँग्रेज़ी बोलने वालें विद्वान लगते है और अँग्रेज़ी ना समझने वाले बेवकूफ़| रोजाना लाखो करोड़ो लोगो को अँग्रेज़ी ना आने की हीन भावना से गुज़रना पड़ता है, फिर चाहे वह तिरस्कार अपनो से हो, या परायों से| निर्देशक गौरी शिंदे ने कुछ इसी भावना को बेहद खूबसूरती से पर्दे पर उतरा है| वही इस फिल्म से 80-90 के दशक की “हवा हवाई” की वापसी हो रही है जिसे लेकर उनके चाहने वाले भी बेहद उत्साहित है|
कहते हैं कि प्रयास अच्छा हो तो भगवान भी साथ देते है। और हुआ भी वही कि एक खूबसूरत फिल्म की शुरुआत में आपको “तलाश” का ट्रेलर देखने को मिलेगा। तो जैसा की राज खुल चुका है, जी हाँ “बर्फी” एक देखने योग्य फिल्म है।
बर्फी (रनबीर कपूर) जो बोल और सुन नहीं सकता और जिसे देख कर चार्ली चैप्लिन और राजकपूर की याद आती है, दार्जिलिंग में अपने पिता के साथ रहता है। कोलकाता से आयी हुए एक लड़की श्रुति (इलीना डी’क्रूज), जिसको देखते ही बर्फी अपने प्यार का इज़हार करता है, थोड़ा इनकार के बाद (शायद इसलिए क्योंकि श्रुती की सगाई हो चुकी है) बर्फी से प्यार करने लगती है। लेकिन श्रुति अपनी माँ को समझाने की हिम्मत ना होने की वजह से बर्फी का साथ छोड़ शादी कर लेती है।इधर बर्फी को अपना प्यार उसके बचपन की दोस्त झिलमिल (प्रियंका चोपड़ा) में मिलता है जो आत्मविमोह* है। फिल्म बर्फी और झिलमिल के स्वार्थहीन प्यार की कहानी है, जहां भावनाएं ही महत्वपूर्ण हैं। इस कहानी के पीछे एक और कहानी भी है, जहां झिलमिल का अपहरण हो गया है।
जहां तक फिल्म की कहानी का सवाल है फिल्म आप को बाँध के रखती है। ऐसा नहीं लगता कि फिल्म का नायक, जो बोल नहीं सकता, कही भी अपनी बात न कह पाया हो। कही कही तो ऐसा लगता है कि उसका न बोल पाना ही शायद उसकी ताकत है। फिल्म शुरू से ही नायक के माध्यम से आप को हँसाना और गुदगुदाना शुरू कर देती है। आपको लगता है जैसे बर्फी आप का अपना है। वो ऐसा है जिसकी गलतियां बार बार माफ की जा सकती हों। हालांकि फिल्म के दोनों मुख्य पात्र असामान्य रूप से बीमारी से ग्रस्त हैं फिर भी फिल्म में रिश्ते और संवेदनाए ही मुख्य भूमिका में है और बीमारी कही भी आगे नही आती। फिल्म की रफ़्तार जैसे ही थोड़ा धीमी पड़ती है वहां पर मध्यांतर आ जाता है। फिल्म में कई सारे बेहतरीन दृश्य है चाहे वो घडी पीछे करना हो, प्रियंका-रणबीर या रनबीर-इलीना के दृश्य हो या चरम दृश्य हो।
फिल्म के दृश्य बेहद खूबसूरत है, और लोकेशन बेहतरीन। वही कुछ बाते ऐसी है जैसे बर्फी की मदद के लिए श्रुति का घर छोड़ देना, झिलमिल से बर्फी के इतने लगाव की वजह साफ़ ना होना, (और श्रुति से भी) या श्रुती से शुरू में इतना लगाव होने पर भी बाद में उसके लिए कोई भावना ना होना, सवाल पैदा करती हैं।
प्रियंका चोपडा का किरदार शायद उनके प्रियंका चोपडा होने की वजह से थोड़ा खींचा गया लगता है और इसी वजह से ना सिर्फ फिल्म धीमी होती है, और कही पर थोड़ा उबाऊ भी होती है। इलीना का कैरेक्टर जिसे थोड़ा और स्थापित किये जाने की जरूरत थी वो हो नहीं पाया।
फिल्म की सिनेकला बेहतरीन है और रवि वर्मन ने हर एक फ्रेम को खूबसूरत बनाया है। फिल्म के दृश्य सत्तर के दशक की याद दिलाते है। प्रीतम का संगीत फिल्म को और बेहतर बनाता है।
निर्देशक अनुराग बासु मानवीय संवेदनाओं को उभारने में हमेशा से माहिर रहे हैं और इस फिल्म में उन्होंने ऊंचाईयों को छुआ है। उन्होंने फिल्म के हर पहलू को उम्दा संभाला है। प्रतिकूल परिस्थितियों में प्यार को बढते दिखाना अनुराग कि खासियत रही है। मेरे मुताबिक़ ये फिल्म संजय लीला भंसाली को जरूर देखना चाहिए।
रनबीर कपूर फिल्म दर फिल्म खुद को स्थापित करते जा रहे हैं। जहां उनके पात्र में चैप्लिन और राजकपूर कि झलक दिखती है वही रनबीर ने खुद को इनकी नक़ल करे जाने के इलज़ाम से कोसो दूर रखा है, यहाँ तक कि उन्होंने निश्चित तौर से अपने अभिनय में खुद के ही रंग डाले हैं।
प्रियंका चोपड़ा के अभिनय की तारीफ़ करनी होगी, ज्यादा इसलिए कि उन्होंने कुछ ज्यादा करने की कोशिश नहीं की अलबत्ता वो कहीं कहीं हाँथ से बाहर जाती दिख रही थी, लेकिन यही निर्देशक का कमाल है कि उन्होंने प्रियंका को सीमा में ही रखा।
इलीना की ये पहली हिंदी फिल्म है लेकिन वो दक्षिण भारत की स्थापित अभिनेत्री है और इस फिल्म की सूत्रधार भी। उनमे एक ताजगी नज़र आई और उनका रोल उनके अच्छे लगने की सीमा के अंदर ही है।
सौरभ शुक्ला ने नियाहत ही उम्दा काम किया है। वो नायक के खिलाफ हैं लेकिन सहानुभूती उनके चेहरे पर है।
कुल मिलाकर बर्फी एक ना छोड़े जाने वाली फिल्म है और इसे देखने की कई वजहे हैं।
बर्फी आप को, आप सब को मुस्कान के साथ ही घर भेजेगा।
*आत्मविमोह - मस्तिष्क के विकास के दौरान होने वाला विकार है जो व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार और संपर्क को प्रभावित करता है। इससे प्रभावित व्यक्ति, सीमित और दोहराव युक्त व्यवहार करता है जैसे एक ही काम को बार-बार दोहराना।
चलिए इस फिल्म के बाद ये तो पक्का ही हो गया है कि भारत-पकिस्तान के बार्डर से ज्यादा गोलियाँ सिर्फ वासेपुर में ही चली हैं। लेकिन हाँ गोलियों के अलावा भी फिल्म में बहुत कुछ है जो देखने लायक है, और यही दुआ करनी होगी की “ये वार आख़िरी ही होगा”।
फिल्म के पहले भाग में किरदारों को पहचानने की समस्या से जूझ रहे दर्शकों को इस बार कम दिमाग खर्चना होगा। फिल्म पहले भाग के आखिरी द्रश्य के साथ शुरू होती है। कुछ नए किरदार जैसे परपंडीकुलर और डेफिनिट भी शामिल किये जाते हैं। सरदार खान (मनोज बाजपेयी) के दूसरे बेटे फैज़ल (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) ने कमान संभाल ली है, और अब सबके एक एक करके मरने की बारी है। बस समस्या ये है कि लोग कहानी में नहीं मर रहे हैं बल्कि लोगो का मरना ही कहानी है।
जहा एक ओर राऊडी राठोर जैसी फिल्मे सफलता कि गारंटी बनती जा रही हैं वही ये देखना काफी सुखद है कि इस गारंटी वाले फार्मूले के बाहर भी कुछ लोग प्रयास कर रहे हैं। फेरारी कि सवारी ऐसा ही एक प्रयास है।
ये दो पिता, दो बेटों और एक दादा-पोते कि कहानी है। रूसी (शर्मन जोशी) जो एक सरकारी दफ्तर में हेड क्लर्क है वो अपने पिता देबू (बमन इरानी) और बेटे कायो (रित्विक सहोरे) के साथ रहता है और अपने बेटे को इंडिया के क्रिकेट टीम में खेलते देखना चाहता है और इसके लिए कोई भी क़ुरबानी देने को तैयार है।
भारत में विकास और उन्नति के नाम पर गरीबों को उजाड कर, उनकी जमीनों पर कब्ज़ा करके जो इंडस्ट्री, शापिंग माल या बिल्डिंग बनाने कि नीति चल रही है उस नीति को हम शंघाई कह सकते हैं।और हाँ अगर आप के अंदर गुंडों को “रिश्ते में हम तुम्हारे बाप लगते हैं”जैसा कुछ बोलने कि ताकत ना हो लेकिन आप डरते हुए भी अपनी ताकत का समझदारी और चतुराई से सदुपयोग कर सकते हैं तो भी आप नायक है आप हीरो हैं।
दबंग और सिंघम जैसी फिल्मो के हिट होने के बाद राउडी राठौर का बनना लाज़मी हो जाता है। अब चूंकि एक क़ानून सा लागू हो चुका है कि ऐसी फिल्मों के लिए अगर हमने कोई सवाल पूछा तो गलती हमारी है।जो भी परोसा गया है उसको भरपेट खाईये। जब सवाल पूछने पर ही पाबन्दी होऔर “क्युकी फिल्मे मनोरंजन के लिए बनायी जाती है”, इस लिहाज़ ऐसी फिल्मों की समीक्षा में सिर्फ इतना बताना चाहिए कि फिल्म में कितनी हिंसा. सेक्स और बेवजह कॉमेडी है।
भारत में दान-दक्षिणा वैसे भी पुण्य का काम माना गया है और ऐसा दान जिससे एक जान दुनिया में आ रही हो और दस जानो को सुकून मिल रहा हो, उसके अच्छे या बुरे होने में ज्यादा बहस नहीं होना चाहिए। वैसे अब आप को ये सुन कर अपने दिमाग में ज्यादा जोर नहीं देना चाहिए क्युकी तनाव वैसे भी स्पर्म-काउंट के लिए ठीक नहीं है, क्युकी विकी-डोनर मूलतः एक प्रेम कहानी है और इस फिल्म के माध्यम से (क्युकी सभी भावनाए और संवेदनाए स्कूल कि किताबो में नहीं पढायी जा सकती।) आप को एक ऐसे विषय (स्पर्म-डोनेशन) के बारे में पता चलेगा जो कई परिवारों को नयी जिंदगी देता है।
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