फिल्मी दुनिया में एक कहावत है, किसी फिल्म के लेखक पर उस फिल्म को डुबाने या पार लगाने का सारा दारोमदार होता है, ऐसे में लीना यादव इस फिल्म की लेखिका होने के साथ निर्देशक भी हैं | यानि कप्तानी के साथ कलम भी उन्हीं के हाथों में था तो फिल्म शब्द के लिए उनकी भूमिका जाहिर है |
फिल्म शब्द एक लेखक की सोच का दायरा और दुनिया की वास्तविकता के बीच के संघर्ष को बताने का एक प्रयास है पर बेहद साहसिक और आधुनिक लहजे में | इस फिल्म में नायक यानि लेखक पति अपनी पत्नी को दूसरे पुरुष के साथ विवाहेतर संबंध बनाने को राज़ी करता है, केवल अपने उपन्यास में यथार्थ के रंग भरने के लिए !
यह कहानी है शौकत वशिष्ठ (संजय दत्त) की, जिसे अपनी एक पुस्तक के लिए 'बुकर पुरस्कार' मिलता है पर उसकी अगली किताब ही जबरदस्त आलोचनाओं का शिकार हो जाती है | दो साल बाद शौकत फिर एक उपन्यास लिखने की हिम्मत जुटाता है पर इस बार वह कहानी को यथार्थ से जोड़ने की कोशिश में अपनी ही जिंदगी के साथ प्रयोग करने की ठान लेता है | ऐसे में शौकत की पत्नी अंतरा (ऐश्वर्या रॉय), जो एक कॉलेज में लेक्चरर है, उसका सहारा बनती है|
शौकत अंतरा को उसके कॉलेज के एक अन्य लेक्चरर यश (ज़ायेद ख़ान) के साथ प्रेमिल संबंध बनाने को उकसाता है| पहले तो अंतरा इस बात का विरोध करती है पर धीरे धीरे वह यश की ओर आकृष्ट होने लगती है| अब कहानी में एक ऐसा मोड़ आता है जिसके बाद शौकत अपनी कहानी की दिशा को बदलने की कोशिश करता है | पर अब काफ़ी देर हो चुकी होती है |
कहानी में पहले शौकत खुद ही अंतरा को उसके सहयोगी की ओर आकृष्ट कराता है पर मध्यांतर के बाद उसे खोने के गम में आँसू बहाता है और अंत आते आते उसीके सौजन्य से वह पागलख़ाने भी पहुँच जाता है | फिल्म के पहले भाग में एक बहाव है पर मध्यांतर के बाद पटकथा में कहीं कहीं काफ़ी असंबद्धता है जिसके कारण कई बार घटनाएँ उपर से गुजर जाती हैं | मसलन शौकत के सामने अंतरा यह कहती है कि वो यश को अपने शादीशुदा होने की बात बता देगी पर उसे यह बात उसे कभी नहीं बताती |
इस फिल्म की सबसे बड़ी रुकावट ऐसी थीम है जो भारतीय सामाजिक मूल्यों पर आघात करती है | कहानी को प्रचलित ढर्रे से कुछ अलग दिखाने की कोशिश में कहानी में एक विचित्रता आ गई जिसके कारण न तो मुख्य पात्रों के वैवाहिक जिंदगी के साथ न्याय हो पाया और न ही विवाहेत्तर संबंध के साथ |
बतौर पहली फिल्म लीना यादव के निर्देशन में एक तीक्ष्णता और कुशलता दिखती है साथ ही लेखन में नया प्रयोग करने का साहस भी | वहीं फिल्म 'चमेली' से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके असीम बजाज का छायांकन इस फिल्म में भी अपने निशान छोड़ जाता है | मसलन संजय दत्त व ऐश्वर्या रॉय के बीच के रोमांटिक दृश्य बेहद कलात्मक ढंग से फिल्माए गए हैं जो बिल्कुल भद्दे नहीं लगते |
विशाल शेखर का संगीत औसत से उपर का रहा| खोया खोया चाँद एवं चाहतों का सिलसिला गाने कानों में रस घोलते हैं, जिनका दृश्यांकन और भी मोहक है | संजय दत्त के किरदार के हाथों में हथियार की जगह कलम... यह बदलाव स्वागत योग्य है | अपने इस पूर्ण विकसित चरित्र के साथ संजय दत्त एक लेखक की संवेदनशीलता दर्शाने में सफल रहे | अंतरा की भूमिका ऐश्वर्या रॉय के अभिनय क्षमता की एक बानगी है| अंतरा के द्वंद और भ्रम को स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत किया उन्होंने |
ज़ायेद ख़ान की बात करें तो वह यश की भूमिका की लिए उपयुक्त नहीं लगे क्योंकि वह कहीं से भी लेक्चरर नहीं दिखते | साथ ही शाहरुख ख़ान की झलक दिखाती उनकी अदायगी अधिकांश जगहों पर सपाट थी | ऐसा लगता है जैसे यश का पात्र अच्छी तरह लिखा नहीं गया |
अंत में, लीना यादव के तीक्ष्ण निर्देशन को मनोहारी दृश्यांकन एवं दक्ष अदायगी का पूरा साथ मिला पर इसकी बोल्ड कहानी व्यावसायिक फिल्मों की श्रेणी में एक प्रयोग कही जा सकती है जो प्रचलित ढर्रे की धज्जियाँ उड़ाता है |
अंक: ***
| निर्देशक | लीना यादव |
| निर्माता | प्रीतिश नंदी कम्युनिकेशंस |
| कहानी | लीना यादव |
| संगीत | विशाल शेखर |
| कलाकार | संजय दत्त, ऐश्वर्या राय बच्चन, ज़ायेद खान |
| फिल्म रिलीज़ | 4 फरवरी, 2005 |
