जे.पी. दत्ता की फिल्में ऐसे भी उत्सुकताएँ बटोर लेती हैं पर जब रिफ्यूजी रिलीज़ हुई तो दर्शकों की आशाएं काफ़ी बढ़ी हुई थी| कारण कहानी को छोड़कर फिल्म के हर पहलुओं को काफ़ी चर्चित बना दिया गया था| इसके अलावे, आकर्षण का केंद्र इस फिल्म का स्टार कास्ट था | प्रशंसकों के बीच जूनियर बच्चन एवं करिश्मा कपूर की छोटी बहन की पहली फिल्म देखने का उत्साह कुछ ज़्यादा ही था, पर यह उत्साह फिल्म की रिलीज़ के बाद ज़्यादा दिनों तक कायम नहीं रह पाया|
रिफ्यूजी एक ऐसे युवक की कहानी है जो भारत पाक सीमा से सटे एक गाँव में रहता है, गाँववाले उसे रिफ्यूजी (अभिषेक बच्चन) कहते हैं| रिफ्यूजी स्मगलिंग के साथ लोगों को गैरक़ानूनी तरीके से सीमा पार करवाने का काम करता है| इसी क्रम में वह एक बांग्लादेशी परिवार से मिलता है जिन्हें पाकिस्तान जाना है| इस परिवार की बेटी है नाज़ (करीना कपूर), जिसकी पहली झलक देखते ही रिफ्यूजी अपना दिल हार जाता है|
सफ़र के दौरान नाज़ को भी रिफ्यूजी से प्यार हो जाता है| कई चुनौतियों का सामना करते रिफ्यूजी नाज़ के परिवार को पाकिस्तान पहुँचा देता है| पाक सीमा पर तैनात सुरक्षा अधिकारी अशरफ (सुनील शेट्टी) भी नाज़ को चाहने लगता है| नाज़ के परिवारवालों को इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं है, यह जानते हुए भी कि नाज़ का दिल रिफ्यूजी के लिए धड़कता है|
इधर भारतीय सीमा सुरक्षा बल को रिफ्यूजी के गैरक़ानूनी गतिविधियों की भनक मिल जाती है और वे उसे पकड़ने की कोशिश में जुट जाते हैं|
बॉर्डर के बाद एक बार फिर जे.पी.दत्ता की यह फिल्म भी भारत पाक मुद्दे को छूती है| फिल्म में जे.पी.दत्ता के कुशल निर्देशन का प्रभाव तो है लेकिन फिल्म के पहले भाग की जमी हुई कहानी उकताहत पैदा करती है| दूसरे भाग में कहानी में कई मोड़ आते हैं पर यहाँ भी खिंचाव दिखता है और कहानी लड़ाई व आतंकवाद की ओर मुड़ जाती है| फिल्म का समापन दृश्य अनोखा सा है जब नायिका भारत पाक सीमा पर बच्चे को जन्म देती है, यह दृश्य फिल्म हिना से प्रेरित लगती है|
इस फिल्म की कहानी व पटकथा भी जे.पी.दत्ता की ही है| एक ही कहानी में उन्होंने कई सारे पहलुओं को एक साथ उठाने की कोशिश जिस कारण सभी पक्षों के साथ इंसाफ़ नहीं हो पाया | साथ ही, नाज़ और रिफ्यूजी की प्रेम कहानी के साथ दर्शक नहीं जुड़ पाए जिसे त्रिकोणीय बनाने की कोशिश काफ़ी घिसी पिटी लगी और इस चक्कर में मुख्य जोड़े की प्रेम कहानी मात खा गई| दीपक वर्कुड का संपादन प्रभावहीन दिखता है| हाँ, ओ.पी. दत्ता के संवाद बेहतरीन थे, जिसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला| छायांकन इस फिल्म की एक और ख़ासियत है जिसमें रण व कच्छ को बेहद खूबसूरत ढंग से प्रस्तुत किया बशीर अली ने|
अभिनय की बात करें तो अभिषेक बच्चन को लेकर अपेक्षाएँ काफ़ी बढ़ी हुई थीं, जिसमें जूनियर बच्चन ने निराश नहीं किया| अभिनय एवं व्यक्तित्व के अलावे अभिषेक की ख़ासियत है उनकी गंभीर आँखें एवं आवाज़, जिसके कारण उनकी अदायगी में एक अलग प्रभाव दिखता है| साथ ही करीना कपूर का चुंबकीय व्यक्तित्व पहली फिल्म में ही दर्शकों का प्यार पाने में सफल रहा, गंभीर व जटिल दृश्यों में भी करीना अनुभवी कलाकारों की तरह सहज दिखी| अभिनय में परिपक्वता की वजह से इन दोनों को ही फ़िल्मफ़ेयर के बेस्ट मेल फ़ीमेल डेवियू पुरस्कार से नवाजा गया था|
इनके अलावे, अशरफ के कठिन पात्र की अदायगी सुनील शेट्टी की यादगार भूमिकाओं में से एक बना गई| जैकी श्रॉफ़ छोटी सी भूमिका में भी अपने निशान छोड़ गये| साथ ही अनुपम खेर के साथ कुलभूषण खरबंदा बेहतरीन रहे|
इस फिल्म की आत्मा है इसका गीत संगीत, जिसके लिए अनु मलिक को श्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला|गाना पंछी नदिया पवन के झोके के लिए गीतकार जावेद अख़्तर भी इस पुरस्कार से सम्मानित किए गये| शेष चार गाने 'मेरे हमसफ़र', ऐसा लगता है', ताल पे जब' एवं ‘रात की हथेली’ भी बेहद सुहावने हैं| इन गानों पर गणेश आचार्य एवं सरोज ख़ान का नृत्य निर्देशन गानों के अनुसार सौम्यता लिए हुए थे| इसके साथ ही आदेश श्रीवास्तव का पार्श्व संगीत फिल्म के प्रभाव को काफ़ी बढ़ा गया|
तीन घंटे बीस मिनट की इस फिल्म में ढीली सी पटकथा व संपादन कमजोर पक्ष रहे लेकिन तीन मुख्य वजहें जिनके कारण यह फिल्म साल की पाँचवीं सर्वाधिक आमदनी वाली फिल्म बनी, वे हैं- संगीत, छायांकन एवं दर्शकों का ध्यान पहले ही आकृष्ट कर चुके मुख्य जोड़ी |
अंक:***
| निर्देशक: | जे.पी.दत्ता |
| निर्माता: | जे.पी.दत्ता |
| लेखक: | जे.पी.दत्ता |
| कलाकार: | अभिषेक बच्चन, करीना कपूर, सुनील शेट्टी |
| संगीत: | अनु मालिक |
| फिल्म रिलीज़: | 30 जून, 2000 |





11 नवम्बर)

(30 सितम्बर)



















