वक्त, नमस्ते लंदन और सिंह ईज़ किंग जैसी फिल्मों के निर्माता निर्देशक विपुल शाह की फिल्म के साथ यदि सलमान ख़ान एवं अजय देवगन जैसे दो बड़े नाम जुड़ जाएँ तो उस फिल्म से उम्मीदें बढ़नी स्वाभाविक ही है | ऐसे में यह फिल्म प्रेम, दोस्ती, द्वंद और फिर महत्वाकांक्षा की कहानी है, ऐसी महत्वाकांक्षा जो दुश्मनी की हद तक जा पहुँचती है|
यह कहानी है बचपन के दो दोस्त अर्जुन (अजय देवगन) और मनु (सलमान ख़ान)| दोनों संगीत से ताल्लुक रखते हैं| अर्जुन का सपना है लंदन के विम्बले स्टेडियम में प्रस्तुति देकर अपने दादाजी का अधूरा सपना पूरा करना, जिसकी वजह से उसके दादाजी ने आत्महत्या कर ली थी | दूसरी तरफ मनु संगीत को लेकर खास गंभीर नहीं है और गाँव के ही एक शादी के बैंड में काम करता है लेकिन मनु में नैसर्गिक प्रतिभा है|
अर्जुन अपना सपना पूरा करने के लिए लंदन चला जाता है जहाँ वह जल्द ही अपना बैंड बना लेता है| इसके बाद अर्जुन मनु को भी अपने बैंड के लिए लंदन बुला लेता है | कुछ प्रस्तुतियों के बाद मनु काफ़ी लोकप्रिय हो जाता है| अर्जुन के बैंड में प्रिया (आसिन) एक डाँसर है जिसे अर्जुन मन ही मन चाहता है पर इज़हार नहीं कर पाता|
इधर मनु छल कपट से दूर सीधे सच्चे दिल का बंदा है जिसकी प्रतिभा और लोकप्रियता देखकर द्वंद में पड़ा अर्जुन उस वक्त सदमें में आ जाता है जब मनु प्रिया से खुलेआम अपने प्यार का इज़हार कर देता है |
अर्जुन मनु से बदला लेने की योजना बनता है और रोम, पेरिस व एम्सटर्डम में तीन बड़े शो रखता है| इसके बाद मनु एक स्थापित गायक बन जाता है पर अब अर्जुन की योजना मनु को बदनामी के जाल में फँसाकर बर्बाद कर देने की है |
इतने उतार चढ़ावों के साथ यह कहानी एक बेहतरीन प्रस्तुति बन सकती थी अगर घटनाएँ ज़रा भी वास्तविकता से जुड़ी होतीं |
- शुरुआत अर्जुन के किरदार से करते हैं जो संगीत और अपना स्वप्न पूरा करने के लिए इस हद तक समर्पित है कि प्रिया के प्यार में पड़ जाने के बाद वह खुद को बेरहमी के साथ बेल्ट से पीटता है , ताकि उसे अपने लक्ष्य से कोई भी डिगा ना पाए ! आज के युग में यह दृश्य हजम नहीं होता |
- जिस तरह अर्जुन के बैंड के निर्माण होता है यह कल्पना से बाहर की बात है | लंदन के ट्रेफलगर स्क्वेयर पर अर्जुन अचानक से गाना शुरू कर देता है जहाँ स्टेज पर अचानक ही रणविजय सिंह और आदित्य कपूर गिटार लेकर उसका साथ देने के लिए प्रकट हो जाते हैं और उनके स्टेज से उतरते ही अर्जुन का अपना बैंड बन जाता है !
- फिल्म की नायिका प्रिया रूढ़िवादी दक्षिणभारतीय परिवार से है| अर्जुन उसके पिता से उसे वर्ल्ड टूर में शामिल होने देने का आग्रह करता है, इस तर्क के साथ कि प्रिया के हुनर को दुनिया के सामने आने देना चाहिए पर दर्शकों को यह पता नहीं चल पाता कि आख़िर अर्जुन किस हुनर की बात कर रहा है! यही सवाल ओडिशन के दौरान खुद प्रिया रणविजय से पूछती है,' मैं क्या करूँ ?"!
- अर्जुन मनु को बर्बाद करने की योजना बनता है| इस क्रम में एक दृश्य में मनु को नमक की जगह धोखे में कोकीन का सेवन करते दिखाया जाता है और तुरंत दूसरे ही पल मनु ड्रग एडिक्ट बन जाता है !
- सबसे बड़ी बात यह समझ में नहीं आती कि फिल्म के दोनों नायकों का हिन्दी गाना सुनने के लिए लंदन में 90,000 लोगों की भीड़ कैसे इकट्ठी हो सकती है ?
इन अविश्वसनीय तर्कों को परे रख दें तो लंदन ड्रीम्स जैसी संगीत प्रधान विषय पर आधारित फिल्म का संगीत ऐसा होना चाहिए था जो फिल्म के सफलता की एक वजह बन पाती... बावजूद इसके शंकर एहसान लॉय का संगीत स्तरीय था| बरसो यारो गाना जोशीला था वहीं जश्न है जीत का एवं मन को अति भावे गाने कर्णप्रिय थे|
विपुल शाह का निर्देशन कमजोर लेखन पक्ष की वजह से कारगर नहीं हो पाया| सेजल शाह का छायांकन प्रशंसनीय है, विशेषकर कॅन्सर्ट्स के दृश्य बेहतरीन बन पड़े हैं| साथ ही सलीम सुलेमान का पार्श्व संगीत अंतराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं |
लंदन ड्रीम्स में अगर किसी की अदायगी सबसे अधिक प्रभावित करती है तो वह हैं सलमान ख़ान जो अपने किरदार के रंग में रंगे नज़र आए| दूसरी तरफ अजय देवगन के पात्र में समर्पण, गंभीरता एवं व्यथा दिखती तो है पर एक गायक/संगीतकार के तौर पर वह दर्शकों के साथ जुड़ने में सफल नहीं हो पाए |
कुल मिलाकर, रिश्तों के अलग अलग रंग दिखती लंदन ड्रीम्स की ख़ासियत खूबसूरत दृश्यांकन एवं सलमान ख़ान व अजय देवगन के बीच के कुछ बेहतरीन दृश्य हैं | तर्क और प्रासंगिकता को परे कर दें तो फिल्म का आनंद लिया जा सकता है |
अंक: **
| निर्देशक | विपुल शाह |
| निर्माता | आशिन शाह |
| कहानी | सुरेश नायर , रितेश शाह |
| संगीत | शंकर एहसान लॉय |
| कलाकार | सलमान खान, अजय देवगन, आसिन |
| फिल्म रिलीज़ | 30 अक्टूबर, 2009 |
