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00 दशक

रिफ्यूजी (Refugee Movie)

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रिफ्यूजीजे.पी. दत्ता की फिल्में ऐसे भी उत्सुकताएँ बटोर लेती हैं पर जब रिफ्यूजी रिलीज़ हुई तो दर्शकों की आशाएं काफ़ी बढ़ी हुई थी| कारण कहानी को छोड़कर फिल्म के हर पहलुओं को काफ़ी चर्चित बना दिया गया था| इसके अलावे, आकर्षण का केंद्र इस फिल्म का स्टार कास्ट था | प्रशंसकों के बीच जूनियर बच्चन एवं करिश्मा कपूर की छोटी बहन की पहली फिल्म देखने का उत्साह कुछ ज़्यादा ही था, पर यह उत्साह फिल्म की रिलीज़ के बाद ज़्यादा दिनों तक कायम नहीं रह पाया|

बैंड बाजा बारात (Band Baaja Baaraat Movie)

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बैंड बाजा बारातशादियों पर आधारित फिल्में हमेशा से हिन्दी दर्शकों को आकर्षित करती रही हैं | ऐसे में फिल्म बैंड बाजा बारात में दिल्ली की मशहूर शादियाँ हैं, उनसे जुड़े गीत-संगीत एवं समारोह हैं, उत्कृष्ट साज़ सज्जा है और सबसे दिलचस्प बात यह कि नायक नायिका शादी करनेवाले जोड़े नहीं बल्कि शादी करवानेवाले वेडिंग प्लानर हैं| बाहरी चमक दमक व धूम धड़ाकों से दर्शकों को आकृष्ट करनेवाले इस फिल्म की कमान मनीष शर्मा के हाथों में थी, जिनकी निर्देशकीय पारी की यह शुरुआत है|

दीवाने हुए पागल (Deewane Hue Pagal Movie)

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दीवाने हुए पागलअपनी फिल्म के माध्यम से दर्शकों को हँसाते हुए कुछ हल्के फुल्के पल देना किसी निर्देशक के लिए कठिन काम है पर दीवाने हुए पागल के निर्देशक विक्रम भट्ट ने इस काम को बखूबी संभाला जबकि उनकी पिछली दो फिल्में असफलता का मुँह देख चुकी थीं| ऐसे में यह फिल्म वापसी का रास्ता तैयार करते हुए उनकी बेहतर फिल्मों में से एक बन गई|

1998 की सफलतम अमेरिकन फिल्म 'देयर इज समथिंग अबाउट मेरी' पर पहले भी एक असफल बॉलीवुड फिल्म बन चुकी थी लेकिन निर्देशक विक्रम भट्ट ने इसकी कहानी को अलग रूप रंग देकर प्रस्तुत किया जो हिन्दी फिल्म के दर्शकों के लिए वाकई मजेदार था|

प्यार के साइड एफेक्ट्स (Pyar Ke Side Effects Movie)

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प्यार के साईड एफेक्ट्सबॉलीवुड फिल्मों की आत्मा प्रेम कहानियों में बसी होती है| ऐसे में तकनीक और बदलाव के इस दौर में फिल्म का हर पक्ष काफ़ी उन्नत हो चला है| फिल्मी कहानियों की ही बात करें तो यहाँ भी प्रेम के बेहद परिपक्व रूप दिखने लगे हैं, चाहे लिव इन रिलेशन के रूप में ही सही|

इस फिल्म का नायक भी प्यार तो करता है पर इसके बाद के पचड़ों में फँसने से डरता है| नायक की इस उलझन को लेखक निर्देशक साकेत चौधरी ने बड़े ही दिलचस्प ढंग से परदे पर उतारा |

मैने प्यार क्यों किया (Maine Pyar Kyun Kiya? Movie)

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मैंने प्यार क्यूँ कियाकॉमेडी फिल्मों के सरताज डेविड धवन के फिल्मी फ़ॉर्मूले में काफ़ी बदलाव नज़र आता है जबसे उनकी जोड़ी सलमान ख़ान के साथ बनी है| यह बदलाव ‘मुझसे शादी करोगी’में सबसे पहले नज़र आया जिसमें पिछली फिल्मों की तरह अश्लीलता या द्विअर्थि संवादों में कमी थी पर हास्य मनोरंजन पहले से ज़्यादा था वह भी ग्लैमर व स्टाइल के तड़के के साथ| अब यह बात अलग है कि डेविड धवन की फिल्मों का पूरा लुत्फ़ उठाने के लिए दिमाग़ को जेब में रखना पड़ता है|

फँस गए रे ओबामा (Phas Gaye Re Obama Movie)

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फँस गए रे ओबामावैश्विक मंदी जैसे गंभीर मुद्दे को अगर फिरौती पर आधारित कहानी के साथ हास्य का जबरदस्त तड़का लगा कर परोसा जाय तो वह फिल्म निश्चित ही अनोखी होगी| कहानी भी ऐसी जिसमें फिरौती करनेवाले स्थानीय अपराधी भी आर्थिक मंदी के शिकार हैं| आलम यह है कि अपराधियों के पास बंदूक तो है पर गोली खरीदने के पैसे नहीं! जीप तो है पर उसे चलाने के लिए पेट्रोल नहीं, यहाँ तक की फ़ोन में आउटगोइंग की सुविधा भी समाप्त हो चुकी है!

जन्नत (Jannat Movie)

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जन्नत

जन्नत कुनाल देशमुख द्वारा निर्देशित हिंदी फिल्म है| फिल्म के मुख्य कलाकार इमरान हाशमी, सोनल चौहान, जावेद शेख, विपिन  शर्मा हैं| फिल्म में संगीत कामरन अहमद, प्रीतम जी ने दिया है|

भट्ट कैंप की फिल्मों की कहानियों में हमेशा एक नयापन मिलता है| फिल्म जन्नत भी एक आम पर बेहद महत्वाकांक्षी इंसान की कहानी है जो अपने सपनों की जन्नत पाने के लिए ऐसे शॉर्टकट रास्तों का चुनाव कर लेता है जो उसे अपराध के दल-दल में फँसा देता है और ऐसे दलदल में उतरना जितना आसान है उतना ही मुश्किल है इससे बाहर निकलना|

मालामाल वीकली (Malamaal Weekly Movie)

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मालामाल वीकली

बात हो रही हो कॉमेडी फिल्मों की और प्रियदर्शन का नाम न आए, यह संभव नहीं| हेरा फेरी, हंगामा और गरम मसाला जैसी जबरदस्त हास्य फिल्मों ने प्रियदर्शन को अग्रिम पंक्ति का निर्देशक साबित कर दिया| इसी कड़ी में मालामाल वीकली निर्देशन के साथ लोकेशन व कहानी की वजह से एक अनोखी फिल्म बन गई जो दर्शकों को लगातार ठहाके लगाने पर मजबूर कर देती है|

दो दूनी चार (Do Dooni Chaar Movie)

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दो दूनी चार

महा नगर में रहने वाले एक मध्यम वर्गीय परिवार की परेशानियों और जोड़ तोड़ को बेहद वास्तविकता के साथ चित्रित किया गया है फिल्म दो दूनी चार में जिसे लेखक निर्देशक हबीब फ़ैसल ने हल्के फुल्के मजाकिया ढंग से प्रस्तुत किया है| कभी कभी मज़ाक में कही गई बात दिल छू जाती है, कुछ ऐसा ही है इस फिल्म में, जिसे देखते हुए यह महसूस होता है जैसी अपनी ही कहानी हो|

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