
90 के दशक में हास्य फिल्मों के सिरमौर रहे डेविड धवन के साथ गोविंदा की यह चौथी फिल्म थी, जिसमें करिश्मा कपूर के साथ एक ऐसी तिकड़ी बनी जिन्हें आगे भी सफलता का स्वाद मिलता रहा | गोविंदा के कैरियर को एक उँचाई तक पहुँचाने वाले डेविड धवन ने इसी तिकड़ी के साथ हीरो न.1 व कुली न.1 जैसी कई सफल फिल्मों का निर्माण किया| इसके बाद गोविंदा हास्य फिल्मों के पर्याय कुछ इस तरह बने कि कई बड़े फिल्मकार गोविंदा के साथ हास्य फिल्म बनाने के ख्वाहिशमंद हो गये |




अपने बच्चों पर अपना सबकुछ लुटा कर, उनको यथासंभव जीवनोपयोगी हर सुख-सुविधा प्रदान करने वाले माता-पिता का उत्तरदायित्व सम्भालने की बारी जब उन बच्चों की आती है,तो उनको किस प्रकार अपने यही माता-पिता बोझ लगने लगते है इसी सर्वकालिक सत्य को आधार बनाकर रवि चोपड़ा ने इस फिल्म का निर्देशन किया है| फिल्म की कहानी सतीश भटनागर, बी.आर.चोपरा तथा शफीक अंसारी ने लिखी है| 





11 नवम्बर)

(30 सितम्बर)



















