‘एक मैं और एक तू’के बाद 'एक दीवाना था' वेलेंटाइन वीक मे प्रदर्शित दूसरी रोमांटिक फिल्म है जिसकी तमिल और तेलुगु वर्ज़न पहले ही सफलता का स्वाद ले चुकी है| निर्देशक गौतम मेनन ने खूबसूरत सी प्रेम कहानी मे एक ताज़गी दिखाने की कोशिश तो की पर वह अपनी बात रखने में सफल नही हो पाए |
कहानी का नायक है सचिन (प्रतीक बब्बर), जिसने हाल ही में एंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की है पर उसकी रूचि फिल्म निर्माण में ज़्यादा है |सचिन का परिवार जुहू में एक किराए के मकान में रहने आता है | वहाँ मकान मलिक की बेटी जेस्सी (एमी जेक्सन) को देखते ही सचिन को पहली नज़र का प्यार हो जाता है|
फिल्म समीक्षा
'लव इज इन द एयर' और वेलेंटाइन डे के ऐसे उत्साह के बीच अगर कोई फिल्म रिलीज़ होती है तो दर्शकों की अपेक्षाएं उस फिल्म के साथ पहले ही जुड़ जाती हैं| 'एक मैं और एक तू' वेलेंटाइन डे के उत्साह को साझा तो करती है लेकिन हँसी ठिठोली के साथ ! यहाँ प्यार का एक दूसरा रोमांचक पहलू भी नज़र आता है|
हिंदी सिनेमा में एक विशेष दर्शक वर्ग को केंद्रित कर फिल्में बनाना आजकल सबसे कम खतरे की बात है। फिर वो दबंग हो या सिंघम हो या जिंदगी ना मिलेगी दुबारा हो। लेकिन इस तरह की फिल्मों के साथ शायद मुसीबत ये है की ये आधे दर्शकों को आकाश की ऊंचाईयों पर लगती है तो आधे को कीचड में पड़ी बिलबिलाती लगती हैं। लेकिन इन देसी और डालर सिनेमा से हट के भी फ़िल्में हैं जो सभी दर्शक वर्गों में देखी और पसंद की जाती है। अग्निपथ इसी श्रेणी की फिल्म है। 
सिंहासन का हिलना और बादशाहत का खत्म हो जाना दो अलग अलग बातें हैं, इस लिहाज़ से शाहरुख खान आज भी हिंदी फिल्मोंके बादशाह हैं लेकिन उनको एक बात समझनी होगी किबादशाहत को कायम रखने के लिए सिंहासन को मज़बूत किये जाने का वक्त आ चुका है|
फिल्म निर्माताओं का एक वर्ग आज भी इस बात पर पूरी तरह विश्वास करता है की इन्टरटेनमेंट के सिर्फ तीन ही मतलब हो सकते हैं - सेक्स सेक्स और सिर्फ सेक्स। और उनका मानना है की अगर जेब में पैसे ठूसने हों तो कहानी में सेक्स ठूसने के बजाये अब सेक्स में कहानी ठूसो । इस लिहाज़ से सिल्क स्मिता की कहानी का चुनाव न सिर्फ एक बेहतरीन व्यावसायिक कदम है बल्कि ये फिल्म निर्माताओं को पूरी छूट देता है की फिल्म की हीरोइन को दिखाने के लिए उसके चहरे को दूसरे नंबर पर रखा जाए ।
विच्छेदित परिवार पर आधारित पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं | मिले ना मिले हम भी एक ऐसी ही फिल्म है जो कद्दावर नेता रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान की पहली फिल्म है | इस फिल्म का नायक पूरी तरह से टेलरमेड अच्छाइयों का पुतला है जो अपने अलग हो चुके माता पिता को फिर से एक साथ करना चाहता है |
नए हिन्दुस्तान की जनता के एक बड़े वर्ग को हमेशा ही एक रॉकस्टार की जरूरत रही लेकिन बाकि सभी अधूरे सपनो के तरह इस ख्वाब को किसी हिन्दुस्तानी फिल्म ने पूरा नहीं किया| लन्दन-ड्रीम्स ने जहा निराश किया वही रॉक-ऑन का प्रभाव भी सीमित था|




11 नवम्बर)

(30 सितम्बर)



















